दीपावाली की चकाचौंध में गुम न हो जाए सदियों पुराना हुनर, मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों का छलका दर्द
दीपावली पर चीनी लाइटों की चकाचौंध के बीच मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हार अपने पुश्तैनी कारोबार को बचाने के ...और पढ़ें

रामपुर के मिलक में 50 साल पुराने हुनर को जिंदा रखकर,हाथ के चाक पर दीये बनाता कुम्हार परिवार। जागरण
HighLights
चाइनीज लाइटों के कारण कम हो रही दीयों की मांग
संवाद सहयोगी, मिलक (रामपुर)। दीपावली पर बाजार चाइनीज झालरों और इलेक्ट्रिक लाइटों से जगमगा रहा है, लेकिन इस चकाचौंध के बीच कुम्हार मिट्टी के दीयों की परंपरा और अपने पुश्तैनी कारोबार को बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। त्योहार पर हर घर में दीया जलता है, मगर इस बार कुम्हारों के चाक की रफ्तार धीमी है।
नगर के मुहल्ला नसीराबाद निवासी 65 वर्षीय कुम्हार राम सिंह बताते हैं कि पिछले कुछ सालों से चाइनीज लाइटों के कारण मिट्टी के दीयों की मांग घटी है।
पहले बड़ी संख्या में दीये बिकते थे, लेकिन अब सौ-दो सौ दीये बेचने के लिए पूरे दिन बाजार में बैठना पड़ता है। उन्होंने यह काम अपने पिता से सीखा, जिन्होंने इसे अपने पिता से सीखा था।

राम सिंह के अनुसार, पहले पूरे मुहल्ले में 10 चाक चलते थे और दिन-रात मिट्टी गूंथने की आवाज सुनाई देती थी। अब गिनती के एक-दो घर ही यह काम कर रहे हैं।
हाथ से चलने वाले पुराने चाक पर दिन में मुश्किल से 200-250 दीये बन पाते हैं। राम सिंह कहते हैं कि कुम्हार फैंसी दीये बनाना और उन्हें रंगना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए जगह और साधन चाहिए।
30 गज के घर में ही रहना, मिट्टी गूंथना, दीये सुखाना और सोना पड़ता है, जिससे परेशानी होती है। पुश्तैनी कारोबार बचाने के लिए उन्होंने सरकार से मदद मांगी है।
उनके मुताबिक, छोटे कुम्हारों को इलेक्ट्रानिक चाक मिले तो काम कई गुना तेज हो सकता है।इससे वे एक दिन में हजारों दीये और चाय के कुल्हड़ बना सकेंगे। राम सिंह चाहते हैं कि उनके बच्चे भी इस काम को आगे बढ़ाएं, वरना यह हुनर उनके साथ ही खत्म हो जाएगा।