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Raebareli lok sabha seat: चुनावी भंवर से निकलने को भावनात्मक रिश्ते का सहारा, राहुल गांधी को विरासत में मिली है यह सीट

अपनी मां सोनिया गांधी से विरासत में यह सीट राहुल को चुनाव लड़ने के लिए मिली है। रायबरेली से गांधी परिवार का पुराना इतिहास जुड़ा है और राहुल इसी भावनात्मक रिश्ते का सहारा ले रहे हैं। मुद्दे की बात करें तो बीते 50 वर्षों में कांग्रेस को समर्थन देने वाली इस सीट को क्या मिला यह भी मुद्दा है जो कांग्रेस को घेर सकता है। पुलक त्रिपाठी की रिपोर्ट....

By Jagran News Edited By: Vivek Shukla Published: Sat, 18 May 2024 02:23 PM (IST)Updated: Sat, 18 May 2024 02:23 PM (IST)
रायबरेली सीट के मैदान में राहुल गांधी मैदान में हैं। जागरण

हाईप्रोफाइल लोकसभा सीटों में शामिल रायबरेली लंबे समय से गांधी परिवार का गढ़ है। इस बार कांग्रेस से राहुल गांधी मैदान में है। एक पारिवारिक सीट अमेठी पिछले लोकसभा चुनाव में गंवा चुके राहुल इस बार क्या परिवार की दूसरी परंपरागत सीट पर विरासत बचा पाएंगे? यह सवाल भी उपस्थित है।

रायबरेली सीट के मैदान में राहुल गांधी के आने से कांग्रेस भले मुकाबले को अपने पक्ष में मानकर बैठी है, लेकिन पिछले चुनाव में राहुल को उनकी ही मजबूत सीट अमेठी में हार का स्वाद चखा चुकी भाजपा रायबरेली में भी जोर लगाने में पीछे नहीं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी से लेकर भाजपा के कई दिग्गज प्रत्याशी दिनेश प्रताप सिंह के लिए यहां सभाएं कर चुके हैं।

भाजपा अपनी सरकार की उपलब्धियों के साथ मैदान में है तो राहुल यहां से 100 वर्ष का भावनात्मक रिश्ता बता रहे हैं। राजनीतिक दृष्टि से इस क्षेत्र को जो कद हासिल हुआ, उससे कई जनपद अछूते हैं। मगर, बीते 50 वर्षों की बात की जाए तो विकास की गति बेहद मंद रही।

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निराला नगर निवासी उमाशंकर शुक्ल बताते हैं कि 1974 में विकास के नाम पर यहां कुछ भी नहीं था। सिर्फ पगडंडियां थीं। बड़ी मुश्किल से एक दो वाहन, वो भी शहर में दिखते थे। कुछ संपन्न लोगों के यहां जीप या ट्रैक्टर हुआ करते थे। कई गांवों के बीच में कभी किसी संपन्न व्यक्ति के यहां साइकिल खरीदकर आई तो उसे देखने लोग आते थे।

शहर का कैपरगंज व घंटाघर मुख्य बाजार थीं। डिग्री कालेज चौराहा हो या सिविल लाइंस यह सब वीरान थे। उस दौर में इंदिरा गांधी ने यहां के लोगों के बारे में सोचा और उन्हें विकास के रास्ते पर लाने के प्रयास किए। इसके लिए उन्होंने 1975 में आइटीआइ की स्थापना कराई।

उन्होंने सुनिश्चित कराया कि आइटीआइ में स्थानीय स्तर पर लोगों को रोजगार मिले, हुआ भी यही। शायद ही कोई गांव रहा हो, मतलब गांव-गांव के लोग योग्यता के अनुसार लोगों को नौकरी न मिली हो। आइटीआइ पहला ऐसा उपक्रम रहा जिसने लोगों को रोजगार से जोड़ा। इंदिरा गांधी अपने इस प्रयास में सफल हुई, उसके बाद यहां उद्योगों के आने का सिलसिला शुरू हुआ।

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शिवमोहन का तर्क है कि आजादी के बाद यहां कांग्रेस आई। जो भी विकास हुआ कांग्रेस ने जरूर शुरू कराए, लेकिन यहां के लोगों ने भी गांधी परिवार को हाथों हाथ लिया। यहां की जनता गांधी परिवार के प्रति समर्पण का इनाम विकास के रूप में पाना चाहती थी, मगर वो स्थान नहीं मिल सका।

यहां के लोगों ने गांधी परिवार से पारिवारिक नाता तो जरूर जोड़ा, लेकिन उनकी उम्मीदें पूरी नहीं हो सकी। 80 के दशक में उद्योगों की स्थापना जरूर हुई, लेकिन 15 वर्षों में ही उन उद्योगों के उजड़ने का सिलसिला शुरू हो गया।

80 वर्षीय कुंवर बहादुर बताते हैं कि गांधी परिवार की जिम्मेदारी थी कि ऐसा विकास होता कि लोग यहां की मिसाल देते, लेकिन सत्ता में रहने और सक्षम होने के बाद भी ऐसा नहीं किया। यह जनता के साथ छलावा है।

रिश्तों को निभाने की डोर दिनों दिन कमजोर हो रही है। कई नामचीन नेता रहे, जिनके क्षेत्र आज सिर्फ विकास के लिए जाने जाते हैं। सैफई इसका जीता जाता उदाहरण है। मुलायम सिंह यादव रहे हो या अखिलेश यादव, इनकी सत्ता तो सिर्फ प्रदेश में रही है।

इन 50 वर्षों में रायबरेली को क्या-क्या मिला

आइटीआइ, एनटीपीसी, एम्स, एफजीआईईटी, स्पिनिंग मिल,आइटीबीपी, रेल कोच-पहिया फैक्ट्री, निफ्ट, रेयान इंटरनेशनल स्कूल, स्पाइस, इंदिरा गांधी आई हास्पिटल, मोहन नेत्र अस्पताल, चौधरी चरण सिंह पंप कैनाल, फिरोज गांधी कालेज, मोतीलाल नेहरू स्टेडियम, मोदी मिल, यूपी टायर ट्यूब।

इन्हें नहीं संजो सके

शीला टेक्सटाइल, स्पिनिंग मिल, यूपी टायर ट्यूब, मोदी मिल, भवानी पेपर मिल, चीनी मिल।


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