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समान मामले में न्यायिक आदेशों में समरूपता जरूरी: इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि समान केस में न्यायिक फैसलों में समरूपता होनी चाहिए। आदेशों में समरूपता से न्याय प्रक्रिया के प्रति वादकारियों में जनविश्वास बढ़ता है। कोर्ट ने कहा कि समान आरोपी अभियुक्तों में से बिना उचित कारण के एक को अग्रिम जमानत और दूसरे को इन्कार अनुच्छेद 14 के समानता के अधिकार और अनुच्छेद 21 के जीवन स्वतंत्रता अधिकार के विपरीत विभेदकारी है।

By Jagran News Edited By: Abhishek Pandey Published: Mon, 10 Jun 2024 08:50 AM (IST)Updated: Mon, 10 Jun 2024 08:50 AM (IST)
समान मामले में न्यायिक आदेशों में समरूपता जरूरी: इलाहाबाद हाई कोर्ट

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि समान केस में न्यायिक फैसलों में समरूपता होनी चाहिए। इसका संबंध फैसले की निष्पक्षता व उचित प्रक्रिया से है। आदेशों में समरूपता से न्याय प्रक्रिया के प्रति वादकारियों में जनविश्वास बढ़ता है।

कोर्ट ने कहा कि समान आरोपी अभियुक्तों में से बिना उचित कारण के एक को अग्रिम जमानत और दूसरे को इन्कार अनुच्छेद 14 के समानता के अधिकार और अनुच्छेद 21 के जीवन स्वतंत्रता अधिकार के विपरीत विभेदकारी है।

ऐसी अनिश्चितता के कारण न्यायिक प्रक्रिया से जनता का भरोसा कम होता है। इसके साथ कोर्ट ने याची की सशर्त अग्रिम जमानत मंजूर कर ली है।

न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने थाना गोपीगंज, भदोही (ज्ञानपुर)के अभिषेक यादव उर्फ लालू की अग्रिम जमानत अर्जी पर यह आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक व्यवस्था नागरिकों के विश्वास पर टिकी हुई है। वादी न्यायिक आदेश पारित करने में निष्पक्ष प्रक्रिया की उम्मीद करता है।

न्यायपालिका में विश्वास एक लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला है। जब नागरिक अपनी शिकायतें अदालत में लाते हैं, तो उन्हें भरोसा होता है कि न्यायपालिका निष्पक्ष न्याय करेगी। यह भरोसा तब खत्म हो जाता है, जब न्यायिक आदेश असंगत होते हैं, जिससे पक्षपात की भावना पैदा होती है। जो संविधान के अनुच्छेद 14 में विहित कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।

मामले के अनुसार ट्रायल कोर्ट ने 20 दिन पहले सह-अभियुक्त की अग्रिम जमानत मंजूर कर ली थी। बाद में दाखिल याची की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी, जबकि वह भदोही थाना गोपीगंज में दर्ज एफआइआर में नामित नहीं था। एफआइआर में याची अभिषेक यादव व सह-आरोपी के खिलाफ एक समान आरोप था।

कोर्ट ने कहा कि न्यायिक कार्यवाही में सुसंगतता का मुद्दा सीधे तौर पर निष्पक्षता और निष्पक्ष प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्षता वादियों के विश्वास के लिए महत्वपूर्ण है। एक बार जब संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की जाती है, तो यह आवश्यक है कि अदालतें वादियों को असंगत आदेशों के अधीन न करें।

न्यायिक अधिकारी का यह घोर कदाचार है, जो न्यायिक कार्यों में भेदभावपूर्ण व्यवहार के रूप में प्रकट होता है। यह कर्तव्य का गंभीर उल्लंघन है। यह न्यायपालिका से अपेक्षित नैतिक मानकों का उल्लंघन करता है तथा न्याय के मूलभूत सिद्धांतों को नुकसान पहुंचाता है।

यह भी कहा कि न्यायिक निर्णयों में निरंतरता सुनिश्चित करना कानून प्रणाली की विश्वसनीयता को बनाए रखने और इसकी प्रक्रियाओं में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।

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