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अनजाने में जातिसूचक शब्द के प्रयोग से नहीं चल सकता एससी-एसटी एक्ट का केस, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुनाया यह फैसला

कोर्ट ने अनजाने में की गई जातिसूचक टिप्पणी पर एससी-एसटी एक्ट के तहत चल रहे केस कार्यवाही को रद कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने देहरादून निवासी अलका सेठी की याचिका पर दिया है। ऐसा अपराध तभी माना जाएगा जब टिप्पणी करने वाला जानता हो कि जिसके खिलाफ जातिसूचक अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहा है वह अनुसूचित जाति व्यक्ति का है।

By Jagran News Edited By: Vivek Shukla Published: Sun, 19 May 2024 08:41 AM (IST)Updated: Sun, 19 May 2024 08:42 AM (IST)
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट पर बड़ा फैसला सुनाया है।

 विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि अनुसूचित जाति के व्यक्ति के विरुद्ध अनजाने में की गई जातिसूचक टिप्पणी पर एससी- एसटी एक्ट की धारा 3(2)(वी) का अपराध नहीं बनता। ऐसा अपराध तभी माना जाएगा जब टिप्पणी करने वाला जानता हो कि जिसके खिलाफ जातिसूचक अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहा है वह अनुसूचित जाति व्यक्ति का है।

कोर्ट ने अनजाने में की गई जातिसूचक टिप्पणी पर एससी-एसटी एक्ट के तहत चल रहे केस कार्यवाही को रद कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने देहरादून निवासी अलका सेठी की याचिका पर दिया है। याचिका पर अधिवक्ता अवनीश त्रिपाठी ने बहस की।

एससी- एसटी एक्ट के मामले में धारा-482 के तहत याचिका की पोषणीयता मामले में विपक्षी अधिवक्ता द्वारा कोई आपत्ति न करने के कारण कोर्ट ने सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भजनलाल केस में धारा-482 की अंतर्निहित शक्ति के इस्तेमाल करने की गाइडलाइंस जारी की है। उसके अनुसार यदि प्रथम दृष्टया अपराध नहीं बनता तो कोर्ट केस कार्यवाही में हस्तक्षेप कर सकती है।

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याची का आरोप है कि भू-माफिया व राजस्व अधिकारियों व तत्कालीन एसएचओ की मिलीभगत से बैनामे से खरीदी उसकी जमीन की पैमाइश कराने के लिए उसे आफिस के चक्कर लगाने को मजबूर किया। एसडीएम के दोनों पक्षों की मौजूदगी में पैमाइश करने के आदेश के विपरीत लेखपाल की मनमानी पैमाइश का विरोध करने पर झूठे केस में फंसाया गया है।

थानेदार ने उसकी शिकायत नहीं सुनी। एक दिन बाद लेखपाल की झूठी एफआइआर दर्ज कर ली गई। इस पर कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया है कि आइजीआरएस व डैशबोर्ड पर की गई याची की शिकायतों की वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से जांच कराएं। जांच चार माह में पूरी की जाय। कोर्ट ने सहारनपुर के थाना बिहारीगढ़ में दर्ज एससी-एसटी के मामले को निरस्त कर दिया है।

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कोर्ट ने कहा चार्जशीट बहुत तकनीकी तरीके से दाखिल की गई है। ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लेकर समन भी जारी कर दिया। कोर्ट ने दर्ज एफआइआर को याची के साथ हुई हाथापाई से बचने के लिए जवाबी हमला माना। साथ ही आश्चर्य व्यक्त किया कि राजस्व अधिकारियों को बांधकर रखा और वरिष्ठ अधिकारियों के मौके पर आने पर छोड़ा।

यह अविश्वसनीय है कि कैसे एक पुरुष और एक महिला इतने सारे लोगों को काबू में करके बांध सकते हैं? और वरिष्ठ अधिकारियों के आने पर छोड़ते है। निःसंदेह यह कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

यह है मामला

18 अगस्त 2023 की दोपहर 1.40 बजे सतपुरा गांव में लेखपाल निरीक्षण कर रहे थे। उसी समय विवाद हुआ। याची देहरादून की निवासी हैं। उसने लोकेश मित्तल से सहारनपुर में जमीन का बैनामा कराया। दाखिल खारिज कराने के बाद सीमांकन की मांग की। इसमें देरी की जा रही थी।

भू-माफिया कब्जा करने की फिराक में थे। जिसकी प्राथमिकी भी दर्ज है। एसडीएम बेहट ने दोनों पक्षों की मौजूदगी में सीमांकन का आदेश दिया था, लेकिन लेखपाल बिना बताए अकेले सीमांकन कर रहा था। इस पर विवाद हुआ तो लेखपाल ने याची के खिलाफ एसटी-एसटी एक्ट के तहत एफआइआर दर्ज करवा दिया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि एससी-एसटी कानून कमजोर को अत्याचार से संरक्षण देने के लिए बनाया गया है, लेकिन व्यक्तिगत प्रतिशोध या हित या खुद को बचाने के लिए इसका बेजा इस्तेमाल किया जा रहा है।


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