नवरात्र में श्रीराम-लक्ष्मण पात्रों की कठिन साधना: बाहरी दुनिया से बनाई दूरी, देवत्व का जगता है भाव
प्रयागराज की पजावा व पथरचट्टी रामलीला कमेटियों की भोर में निकलने वाली चौकियों में श्रीराम-लक्ष्मण के पात्र नवरात्र में बाहरी दुनिया से दूर रहकर कठिन साधना करते हैं।

प्रयागराज के पजावा रामलीला कमेटी की भोर की चौकी में श्रीराम-लक्ष्मण का पात्र निभाने वाले कलाकार। जागरण
HighLights
श्रीपथरचट्टी व पजावा रामलीला कमेटी पात्रों की कठिन साधना
प्रयागराज में भाेर की चौकियों में पात्र बनने वाले रखते हैं कठिन व्रत
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। न मोबाइल का प्रयोग न ही अपनों से संपर्क। टीवी भी नहीं देखते, बाहरी दुनिया में क्या हो रहा है? उससे अनभिज्ञ हैं प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण। देवत्व का भाव लाने के लिए सात्विक जीवन व्यतीत कर रहे हैं। नवरात्र के नौ दिन व्रत रखकर साधना करते हैं।
भोर में चौकियों पर श्रीराम-लक्ष्मण होते हैं आसीन
यहां बात हो रही है श्रीपथरचट्टी रामलीला कमेटी और श्रीमहांत बाबा हाथीराम पजावा रामलीला कमेटी की भोर में निकलने वाली चौकियों के पात्रों की। भोर चार बजे चौकियों में आसीन होकर भगवान श्रीराम और लक्ष्मण दर्शन देने निकलते हैं।

ये कलाकार निभाते हैं पात्र
श्रीधर्मज्ञानोपदेश संस्कृत महाविद्यालय के गुरुकुल में रहकर पढ़ाई करने वाले छात्र श्रीमहांत बाबा हाथीराम पजावा की चौकियों में पात्र बनते हैं, 14 वर्षीय अंश पाठक सीता, 16 वर्षीय उत्कर्ष पांडेय श्रीराम और 15 वर्षीय अंश तिवारी लक्ष्मण का पात्र निभाने के लिए चुने गए हैं। रात दो बजे से इनका शृंगार शुरू होता है। उत्कर्ष कहते हैं मोबाइल और टीवी से दूरी है। अपने पात्र से जुड़े श्लोक और चौपाइयों का अध्ययन करते हैं।
भगवान का पात्र निभाने के लिए तन-मन में पवित्रता हो
श्रीपथरचट्टी रामलीला की चौकी में सैदाबाद निवासी 14 वर्षीय समर दुबे को श्रीराम और अभिनंदन तिवारी को लक्ष्मण बनाया जाता है। वे कहते हैं भगवान का पात्र निभाने के लिए तन और मन में पवित्रता होनी चाहिए। इसके लिए पवित्र वाणी और सादा खान-पान का ध्यान रखते हैं। पजावा रामलीला कमेटी के निर्देशक सचिन गुप्ता के अनुसार सात्विक विचार वाले 10 से 16 वर्ष के लोगों को श्रीराम-लक्ष्मण बनाने के लिए चुना जाता है।
मापदंड पर खरा उतरने पर होता है पात्र चयन
कमेटी के सदस्य उनकी गतिविधियों के बारे में पता लगाते हैं। खरा उतरने पर एक माह पहले संपर्क करते हैं। दशहरा पर्व पर उन्हें अपने पास रखकर खाने-पीने का प्रबंध कराते हैं। इस दौरान बाहरी लोगों से मिलने पर पाबंदी रहती है। वह श्लोक का पाठ करते हैं। रात दो बजे से उनकी सजावट होने लगती है। शारदीय नवरात्र की तृतीया से नवमी तिथि तक भोर चार बजे चौकियां निकलती हैं। दशहरा के बाद भी उन्हें कमेटी की देखरेख में रखा जाता है। भरत मिलाप के बाद उनके घर छोड़ देते हैं।
