प्रयागराज में रजवाड़ा खानदान के 'हातों' का है अनूठा इतिहास, आप भी जानें इनके चर्चित होने की रोचक यात्रा
प्रयागराज में रजवाड़ा खानदान के हातों का एक अनूठा इतिहास है। व्यापारियों और पूंजीपतियों ने व्यापार के लिए हाते बनाए। ...और पढ़ें

प्रयागराज के हाते रजवाड़ा खानदान का अनूठा इतिहास है, ठाकुर दीन के हाता में श्रीराम जानकी मंदिर। जागरण
HighLights
व्यापार के लिए बने 'हाते' के जन्मदाता व्यापारी और पूंजीपति भी रहे
होता था लोहे का व्यापार तो नाम पड़ गया लोहिया पांडे का अहाता
अमरदीप भट्ट, प्रयागराज। शहर जब ज्यादातर वीरान और निर्जन क्षेत्र हुआ करता था, बसावट कम और अब के जैसी भीड़ नहीं थी तब 'हातों' ने छोटी-छोटी बस्तियों को जन्म दिया। इनके जन्मदाता रहे व्यापारी, पूंजीपति और विभिन्न प्रांतीय खंडों के रजवाड़े खानदान। अंग्रेजी शासन तब धीरे-धीरे अपना प्रभाव जमाने लगा था और लोगों पर जुल्म ढाए जाने लगे थे।
प्रजा को मामूली किराए पर दी जमीन
मुट्ठीगंज क्षेत्र में बाहर से आए लोगों ने अपने-अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए जमीन खरीदी, वहां व्यापार जमाया और देखरेख करने के लिए प्रजा को मामूली किराया तय करते हुए उसी जमीन के छोटे-छोटे हिस्सों में रखते गए। आम बोलचाल में इसे 'हाता' कहा जाने लगा है। हाते बदले हुए भौतिक स्वरूप में तो हैं लेकिन जिनके नाम पर इन्हें प्रसिद्धि मिली वह अब दुनिया में नहीं हैं।

होता था लोहे का व्यापार, नाम पड़ा लोहिया पांडे का हाता
पुराने शहर में बहादुरगंज और कोठापारचा के बीच में लोहिया पांड़े (पांडेय) का हाता है। मीरजापुर के रहने वाले गंगा प्रसाद पांडेय ने लगभग 120 साल पहले यहां एक बड़ी जमीन खरीद ली थी। इससे पहले जब वे मीरजापुर से इलाहाबाद आए थे तो यहीं एक जंगली क्षेत्र के बीच एक टूटे-फूटे घर में रात बिताई थी। यहीं जमीन लेकर व्यापार करना चाहते थे लेकिन स्थानीय लोगों ने भूत-प्रेत वाली जगह बताकर उन्हें डराने का प्रयास किया था।
लोहे का व्यापारी होने से लोहिया पांडे का बना हाता
गंगा प्रसाद ने हिम्मत नहीं हारी और भू स्वामी से सौदा कर ही लिया। गंगा प्रसाद पांडेय के बारे में बताया जा रहा है कि वह लोहे के बड़े व्यापारी थे। लोहे की ढलाई का कारखाना संचालित करते थे। उन्हें यहां बस जाने के बाद लोग लोहे का व्यापारी होने के नाते 'लोहिया' कहने लगे। तब से ही जुबानी तौर पर नाम हो गया लोहिया पांड़े। परिवार की एक महिला मीना, बताती हैं कि गंगा प्रसाद पांडेय की कोई संतान नहीं थी। प्रापर्टी और वंश चलाने के लिए उन्होंने भांजे श्रीकृष्ण द्विवेदी का लालन पालन किया। गंगा प्रसाद पांडेय और श्रीकृष्ण द्विवेदी ने हाता की जमीन पर धीरे-धीरे लोगों को किराये पर देना शुरू कर दिया। श्रीकृष्ण की पुत्रवधू मीना बताती हैं कि जमीन पर गंगा प्रसाद ने खरीदी थी तब उस पर खेती होती थी। वर्तमान में इस हाते में व्यापारियों की बस्ती है।

रानी बेतिया के नाम से जाना जाता है बेंतिया हाता
मुट्ठीगंज में बेतिया हाता बिहार स्टेट की रानी बेतिया के नाम पर प्रसिद्ध हुआ। जब शहर में अंग्रेजी शासन हुआ तब मुट्ठीगंज ही ऐसा है जहां गल्ले का व्यापार होता था। कुछ ही दूर पर बलुआघाट में यमुना नदी बहती हैं। इसे देखते हुए रजवाड़े और पूंजीपतियों ने यहां जमीन खरीदकर व्यापार फैलाना शुरू किया। शुरुआत में इसी जमीन पर रानी बेतिया ने भगवान वेणी माधव और मां गंगा की मूर्ति स्थापित कराकर मंदिर का निर्माण कराया था। इसके बाद जमीन, मंदिर तथा व्यापार को बनाए रखने के लिए प्रजा को बसाना शुरू किया।
करीब सवा सौ साल पुराना इतिहास
बाद में यही हाता के नाम से प्रसिद्धि पाने लगा। इसमें रहने वाले एसके पांडेय कहते हैं कि करीब सवा सौ साल पुराना इतिहास है। रानी बेतिया का अब यहां कोई वंशज नहीं है लेकिन उनके नाम पर जमीन जरूर है। जिन प्रजा को रानी बेतिया ने किरायेदारी पर जमीन दी थी उनके वंशज रह रहे हैं। सभी के अपने-अपने व्यापार तथा आजीविका के अन्य साधन हैं।

राजा बारा के हाते में पहले होती थी खेती
मुट्ठीगंज में राजा बारा का हाता ऐतिहासिक और आवासीय क्षेत्र है। इसमें अधिकांश व्यापारी रहते हैं। इसी में स्वतंत्रता सेनानी पार्क है। राजा बारा के संबंध में प्रामाणिक रूप से अभिलेख अब दुर्लभ हैं जबकि इस हाते में रहने वाले व्यापारी अनूप केसरवानी तथा अन्य बताते हैं कि राजा बारा, यमुनापार के रहने वाले थे। यहां बड़ी जमीन लेकर उन्होंने खेती शुरू कराई थी। इसके बाद अनाज का व्यापार हुआ था।

हाता के दायरे वाले क्षेत्र में 100 से ज्यादा छोटे-बड़े मकान
व्यापार के सिलसिले में बड़ी जमीन पर ऐसे लोग बतौर किरायेदार बसाए जाने लगे जो व्यापार में श्रमदान कर सकें और जमीन की देखदेख भी होती रहे। अंग्रेजी शासनकाल में इस हाते के चारों ओर सुरक्षा के दृष्टिकोण से चारदीवारी थी। उसी के भीतर लोग रहते थे। धीरे-धीरे यह बस्ती राजा बारा के हाता के नाम से प्रसिद्ध हो गई। वर्तमान में इस हाता के दायरे वाले क्षेत्र में 100 से ज्यादा छोटे-बड़े मकान हैं।
धर्मदास हाता में पहले था आश्रम
धर्मदास का हाता, पंचायती अखाड़ा के बाबा धर्म दास के नाम पर पड़ा। इसमें बाबा धर्मदास की समाधि पीपल के एक वृक्ष के पास में है। बताया जा रहा है कि बाबा धर्मदास पंचायती अखाड़े से संबंधित थे और इनके यहां पहलवानी सिखाई जाती थी। तमाम नामी पहलवान पंचायती अखाड़ा से होकर निकले। बाबा धर्मदास ने मुट्ठीगंज में जिस जमीन पर आश्रम बनाकर शिष्यों को बसाया, उनका मंदिर अब भी है। हालांकि इस क्षेत्र में अब गली और सैकड़ों पक्के मकान हैं। केवल नाम ही रह गया है धर्मदास का हाता। बाबा धर्मदास के मानने वाले यहां अब भी हैं लेकिन उनके आश्रम का संचालक कोई नहीं है।
यह हाते भी हुए प्रसिद्ध
राजरूपपुर रोड पर जगमल का हाता, मुट्ठीगंज में जालिम सिंह का हाता, रानी फूलपुर का हाता, बेली रोड पर मुल्ला का हाता।
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