UPPSC में पतंजलि योगपीठ का शुभारंभ: सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने योग, निष्पक्षता और जनसेवा पर दिया जोर
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने यूपीपीएससी परिसर में पतंजलि योगपीठ का उद्घाटन किया। उन्होंने योग के महत्व, निष्पक्ष चयन प्रक्रिया और कर्मचारियों के कल्याण पर जोर दिया।

उप्र लोक सेवा आयोग, प्रयागराज में कार्यक्रम को संबोधित करते सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ सिंह। जागरण
HighLights
निष्पक्ष चयन, पारदर्शिता और जनविश्वास को बताया आयोग की सर्वोच्च प्राथमिकता
कर्मचारी आवासीय परिसर का लोकार्पण, विवेकानंद प्रतिमा का भी किया अनावरण
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) परिसर में सोमवार को पतंजलि योगपीठ परिसर का शुभारंभ किया गया। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने उद्घाटन किया। इस अवसर पर कर्मचारियों के लिए निर्मित आवासीय परिसर का लोकार्पण तथा स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा का अनावरण भी किया।
मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि योग व्यक्ति को अनुशासन, संतुलन और आत्मबोध सिखाता है। सार्वजनिक जीवन में इन गुणों का विशेष महत्व है, क्योंकि लोक सेवकों को अनेक बार दबावपूर्ण परिस्थितियों में भी धैर्य और विवेक के साथ निर्णय लेने होते हैं। आयोग परिसर में योग से जुड़ी सुविधाओं का विकास स्वस्थ, संतुलित और सकारात्मक कार्य संस्कृति को प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
उन्होंने कहा कि किसी संस्थान की मजबूती केवल उसकी इमारतों और संसाधनों से नहीं, बल्कि वहां कार्य करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के समर्पण, सत्यनिष्ठा तथा पेशेवर उत्कृष्टता से निर्धारित होती है। कर्मचारियों को सुरक्षित और सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराना भी उनके कल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। स्थिर आवास व्यक्ति को सुरक्षा, सुविधा और मानसिक संबल प्रदान करता है, जिससे वह अपनी जिम्मेदारियों का बेहतर ढंग से निर्वहन कर सकता है।
न्यायमूर्ति ने स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोक सेवा का वास्तविक अर्थ जनकल्याण में निहित है। किसी पद का महत्व उसके साथ मिलने वाले अधिकारों से नहीं, बल्कि उन अधिकारों के माध्यम से किए जाने वाले जनहित के कार्यों से निर्धारित होता है। योग परिसर, आवासीय सुविधा और विवेकानंद की प्रतिमा का अनावरण तीनों मिलकर कर्मचारियों के कल्याण, संस्थागत विकास और सेवा के आदर्शों को मजबूत करने का संदेश देते हैं।
उन्होंने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की भूमिका पर चर्चा करते हुए कहा कि आयोग केवल रिक्त पदों को भरने वाली संस्था नहीं है, बल्कि वह प्रदेश के प्रशासनिक तंत्र के लिए योग्य और सक्षम अधिकारियों का चयन करता है। इन अधिकारियों के निर्णयों का प्रभाव विद्यालयों, अस्पतालों, पुलिस व्यवस्था, राजस्व प्रशासन, स्थानीय विकास और कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंचता है।
बोले कि इसलिए चयन प्रक्रिया में योग्यता, निष्पक्षता और समान अवसर की रक्षा अत्यंत आवश्यक है। संविधान का अनुच्छेद 16 लोक नियोजन में समान अवसर सुनिश्चित करता है। इस संवैधानिक भावना को वास्तविक रूप देने की जिम्मेदारी चयन संस्थाओं पर है। अभ्यर्थियों को यह विश्वास मिलना चाहिए कि सरकारी सेवाओं में चयन किसी प्रभाव, पहचान या पक्षपात के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी क्षमता, ज्ञान, विवेक और योग्यता के आधार पर होगा।
उन्होंने भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता के बीच संतुलन बनाए रखने पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, भर्ती में अनावश्यक देरी से सरकारी पद रिक्त रहते हैं और प्रशासनिक कार्य प्रभावित हो सकते हैं, जबकि अपारदर्शी प्रक्रिया जनविश्वास को कमजोर करती है। इसलिए स्पष्ट नियमों, सुरक्षित परीक्षा व्यवस्था, समान मानदंडों और प्रभावी शिकायत निवारण की व्यवस्था जरूरी है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने आयोग में तकनीक के उपयोग और प्रक्रियाओं को सरल बनाने के प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि डिजिटल पंजीकरण और आधुनिक प्रणालियां अभ्यर्थियों की असुविधा कम कर सकती हैं तथा संस्थागत दक्षता बढ़ा सकती हैं। हालांकि, तकनीकी सुधारों के साथ विश्वसनीयता, सुरक्षा और अभ्यर्थियों की समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता बनाए रखना भी आवश्यक है।
न्यायमूर्ति ने प्रयागराज के ऐतिहासिक और प्रशासनिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि यह शहर लंबे समय से देश के शैक्षणिक, न्यायिक और प्रशासनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। उन्होंने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की स्थापना और उसके विकासक्रम पर भी प्रकाश डाला। बताया कि भारत सरकार अधिनियम, 1935 के प्रावधानों के तहत एक अप्रैल 1937 को उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग का गठन हुआ और इसका मुख्यालय इलाहाबाद में स्थापित किया गया था। शुरुआती वर्षों में आयोग के सामने सीमित संख्या में पदों के लिए परीक्षाएं आयोजित करने की जिम्मेदारी थी, लेकिन समय के साथ अभ्यर्थियों की संख्या और भर्ती प्रक्रिया का दायरा काफी बढ़ा है।
उन्होंने कहा कि आयोग की प्रतिष्ठा उसके अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा किए जाने वाले उन सावधानीपूर्ण कार्यों से बनती है, जिन्हें आम जनता प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख पाती। प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों के बीच समन्वय, अभिलेखों का रखरखाव, उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन और शिकायतों का निस्तारण जैसे कार्य निष्पक्ष चयन प्रक्रिया के आधार हैं। संबोधन के अंत में आयोग के अधिकारियों और कर्मचारियों को नई पहलों के लिए बधाई देते हुए आशा जताई कि संस्था योग्यता का सम्मान करने, पारदर्शिता बनाए रखने और नागरिकों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में निरंतर कार्य करती रहेगी।
संस्थागत नीयत और संविधान को बताया मार्गदर्शक
आयोग के अध्यक्ष संजय श्रीनेत ने कहा कि भारतीय संस्कृति में नमस्ते का आध्यात्मिक अर्थ प्रत्येक व्यक्ति के भीतर विद्यमान दिव्यता का सम्मान करना है। यही भावना न्याय व्यवस्था और चयन प्रक्रिया की मूल आत्मा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का आधार निष्पक्षता है और चयन संस्था के रूप में लोक सेवा आयोग का अस्तित्व भी इसी सिद्धांत पर टिका है।
उन्होंने कहा कि न्यायालय में प्रभाव या सत्ता के बजाय साक्ष्य और तर्क को महत्व मिलता है, उसी प्रकार भर्ती प्रक्रिया में पहचान या अनुग्रह के बजाय पात्रता और योग्यता निर्णायक होनी चाहिए। आयोग का ध्येय वाक्य ‘योग्यता का सम्मान, राष्ट्र का निर्माण’ इसी विचार को अभिव्यक्त करता है।
श्रीनेत ने कहा कि आयोग केवल परीक्षाओं का संचालन नहीं करता, बल्कि भविष्य के प्रशासनिक तंत्र के निर्माण में योगदान देता है। यहां से चयनित अधिकारियों के निर्णयों का प्रभाव दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों के अधिकारों और उनके जीवन पर पड़ता है। इसलिए चयन प्रक्रिया की शुचिता और निष्पक्षता का महत्व और भी बढ़ जाता है।
उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ब्लॉकचेन और अन्य आधुनिक तकनीकों के दौर में आयोग की प्रक्रियाएं बदल सकती हैं, लेकिन सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता का महत्व कभी कम नहीं होगा। कोई भी तकनीक संवैधानिक जवाबदेही का विकल्प नहीं बन सकती।
आयोग अध्यक्ष ने कहा कि पद और व्यक्ति समय के साथ बदलते रहते हैं, लेकिन संस्थागत संरचनाएं और संवैधानिक मूल्य स्थायी महत्व रखते हैं। अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे संस्था को अधिक मजबूत, पारदर्शी और लोकतांत्रिक बनाकर अगली पीढ़ी को सौंपें। उन्होंने कहा कि सफलता व्यक्ति को अनेक सुविधाएं दे सकती है, लेकिन उसका चरित्र ही उसकी स्थायी विरासत निर्धारित करता है।
आयोग के अधिकारियों, कर्मचारियों और अन्य गणमान्य लोगों की उपस्थिति में योग, कर्मचारी कल्याण, संस्थागत सुधार और लोक सेवा के मूल्यों को केंद्र में रखते हुए इन पहलों के महत्व को रेखांकित किया गया। कार्यक्रम में न्यायिक, प्रशासनिक और अन्य क्षेत्रों से जुड़े अधिकारी व कर्मचारी समेत उपस्थित रहे।
