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झुलनी का रंग सांचा हमार पिया...को मधुर स्वर देने वाले प्रयागराज के श्रीकांत वैश्य आज भी लोगों के दिलों में कर रहे राज

By Digital Desk Edited By: Brijesh Srivastava
Published: Tue, 17 Mar 2026 04:47 PM (IST)

प्रयागराज के श्रीकांत वैश्य जिन्होंने झुलनी का रंग सांचा को अपनी आवाज दी, आज भी लोगों के दिलों पर राज ...और पढ़ें

झुलनी का रंग सांचा गीत गाने वाले प्रयागराज के श्रीकांत वैश्य, जिन्हें उप्र संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। जागरण

झुलनी का रंग सांचा गीत गाने वाले प्रयागराज के श्रीकांत वैश्य, जिन्हें उप्र संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। जागरण 

HighLights

  1. दृष्टिहीन यह कलाकार लोक-संस्कृति के आकाश में ध्रुवतारे की तरह चमक रहा

  2. हनुमानगंज के बरेठी गांव में पहली बार सुना था झुलनी का रंगा सांचा लोकगीत

  3. उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हुए शाहगंज के श्रीकांत वैश्य

अमरीश मनीष शुक्ला, प्रयागराज। प्रयागराज की पहचान केवल त्रिवेणी के संगम से नहीं, बल्कि उन 'सुर-संगमों' से भी है जो गलियों के सन्नाटे में जन्म लेते हैं और पूरे देश की जुबान पर चढ़ जाते हैं। उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारों की घोषणा ने एक ऐसे नाम पर मुहर लगाई है, जिसका स्वर हम सबने सुने हैं, लेकिन जिसे जानने की फुर्सत शायद शहरवासियों को नहीं थी। यह कहानी है श्रीकांत वैश्य की। वह साधक जिन्होंने अपनी आंखों की रोशनी तो बचपन में ही खो दी, पर जिनके कंठ से निकली 'झुलनी का रंग सांचा हमार पिया.' आज भी लोक-संस्कृति के आकाश में ध्रुवतारे की तरह चमक रही है।

छोटा कद, दुबली-पतली काया...

जानसेनगंज चौराहे से लीडर रोड की ओर कदम बढ़ाइए। सौ कदम बाद बाइक एक ऐसी गली में मुड़ती है जहां धूप भी संकोच से उतरती है। शोर कम होने लगता है और एक अजीब सी शांति आपके साथ चलने लगती है। तीन मोड़ों के बाद जब आप दुर्गापूजा पार्क के पास उस साधारण से मकान की सीढ़ियां चढ़ते हैं तो वातारण बदलने लगता है। ऊपर पहुंचते ही सामने एक शख्सियत खड़ी मिलती है। छोटा कद, दुबली-पतली काया, सलीके से पहने हुए शर्ट-पैंट और चेहरे पर एक अतीन्द्रिय तेज। आंखों पर काला चश्मा है।

शिष्टाचार नहीं, उस पुरानी तहजीब का हिस्सा

जैसे ही उनके पुत्र चंदन मेरा परिचय कराते हैं, श्रीकांत जी के हाथ हवा में मुझे तलाशने लगते हैं। जैसे ही हाथ मिलाया, उन्होंने मुझे खींचकर सीने से लगा लिया। रुंधे गले से बोले  "धन्य हो गया जो आपके चरण पड़े... मेरे गुरु विप्र रहे हैं और मेरा परिवार आपके बंधुओं का ऋणी है।" यह शिष्टाचार नहीं, उस पुरानी तहजीब का हिस्सा है जो अब विरली ही मिलती है।

वर्ष 1979 का वह सावन सजीव हो उठा

कमरे की छत के पास का टांड़ स्मृति-चिह्नों और मेडल से भरा पड़ा है, मानो हर पदक उनके संघर्ष की एक ईंट हो। बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो वर्ष 1979 का वह सावन सजीव हो उठा। श्रीकांत जी बताते हैं, "मेरे भाई किरण (मुन्ना भैया) मुझे हनुमानगंज के बरेठी गांव ले गए थे। धान की रोपाई हो रही थी। कीचड़ में सनी ग्रामीण महिलाएं झुककर कुछ गा रही थीं। जैसे ही हम करीब पहुंचे, वे लजाकर चुप हो गईं।"

श्रीकांत जी की आत्मा को झकझोर दिया

श्रीकांत जी ने मनुहार की तो उन महिलाओं ने जो अलापा, उसने उनके जीवन की लय बदल दी। ग्रामीण महिलाओं ने जो 'रोपनी' (लोकगीत) गाई, उसने श्रीकांत जी की आत्मा को झकझोर दिया। वहां से उन्हें पता चला कि असली लोकगीत का खजाना गांव के छोटकऊ महाराज के पास है। वहां पहुंचकर उन्होंने अपना परिचय 'आकाशवाणी के मतइल काका (दीक्षित जी)' के संदर्भ से दिया। उस दिन एक टेप रिकार्डर में जो स्वर कैद हुआ, वह लोकगीत था— 'झुलनी का रंग सांचा हमार पिया...'। श्रीकांत जी ने उन स्वरों को अपने भीतर उतार लिया। इसे टेप रिकार्डर में रिकार्ड किया, बस इसे सुनकर उन्होंने भारतीय लोक संगीत के इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया।

रातों-रात मशहूर हो गया गीत

वर्ष 1979 में गोरखपुर आकाशवाणी से पहली बार यह गीत 'आन एयर' हुआ और रातों-रात मशहूर हो गया। लेकिन इसकी मुकम्मल पहचान तब बनी जब लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान उन्हें एल्बम का आफर मिला। वहां उनकी मुलाकात प्रसिद्ध लेखक चंद्रशेखर मिश्र से हुई। श्रीकांत चाहते थे कि यह गीत पुरुष और महिला के संवाद (युगल) के रूप में आए।

उस एलबम ने श्रीकांत वैश्य को नई पहचान दी 

वे याद करते हैं, "तीन दिनों तक चंद्रशेखर मिश्र पंक्तियां बदलते रहे, लिखते रहे, पर वो बात नहीं बन रही थी। फिर एक रात अचानक चंद्रशेखर जी ने मुझे नींद से जगाया और सुनाया- कवन सुनरवा बनाये रे झुलनिया... बस, वही वो पल था जब 'झुलनी' ने अपना पूर्ण रूप लिया।" 1980 के उस एलबम ने श्रीकांत वैश्य को घर-घर का नाम बना दिया।

संगीत के लिए मां ने गहने गिरवी रखे थे

बातचीत के दौरान अचानक श्रीकांत जी की आवाज थरथराई और आंखों के चश्मे के पीछे से आंसुओं की एक धार बह निकली। उन्होंने बताया कि इस संगीत के लिए उनकी मां पार्वती ने अपने गहने तक गिरवी रख दिए थे। "आज वो गहने मेरे पास हैं," वे कहते हैं, "मैंने बच्चों से कहा है, ये गहने नहीं, मेरी मां की ममता और संघर्ष की गवाही हैं, इन्हें प्राणों से बढ़कर संभालना।" "चेचक ने 6 साल की उम्र में मेरी बाहरी आंखें छीन लीं, पर शायद मां सरस्वती ने भीतर की आंखें खोल दीं।"

उन्होंने अपना पुराना हारमोनियम संभाला

इंटरव्यू के अंत में उन्होंने अपना पुराना हारमोनियम संभाला। जैसे ही उनकी उंगलियों ने 'सप्तक' को छुआ, कमरे की हवाएं जैसे ठहर गईं। जब उन्होंने अपने कालजयी स्वर में 'झुलनी का रंगा सांचा' गुनगुनाया, तो लगा कि कमरे की दीवारें गायब हो गई हैं और हम किसी दैवीय लोक में बैठे हैं। उनकी बंद आंखें जैसे ब्रह्मांड के किसी अनदेखे हिस्से को देख रही थीं।

'हमारी संस्कृति अंतिम सांसें ले रही हैश्

जाते-जाते उन्होंने एक ऐसी बात कही जो हर संवेदनशील नागरिक को चुभनी चाहिए। हाथ जोड़कर बोले- "हमारी संस्कृति अंतिम सांसें ले रही है। लोककलाएं विलुप्त हो रही हैं। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से मेरा करबद्ध निवेदन है कि इसे बचा लीजिए। स्कूलों में इसे अनिवार्य कीजिए, युवाओं को इसमें करियर दीजिए, वरना हमारी पीढ़ी के साथ यह विधा भी चिता पर चढ़ जाएगी।"

अंधेरे में रहकर भी दुनिया को सुरों की रोशनी दी

सीढ़ियों से उतरते समय मेरे कानों में उनके शब्द गूंज रहे थे। श्रीकांत वैश्य सिर्फ एक गायक नहीं, बल्कि प्रयागराज की उस 'थाती' के रक्षक हैं जो बाजारीकरण के दौर में अपनी पहचान खो रही है। 2026 में मिला यह अकादमी पुरस्कार दरअसल उस निष्काम साधना का सम्मान है, जिसने अंधेरे में रहकर भी दुनिया को सुरों की रोशनी दी।

प्रमुख उपलब्धियां (एक नजर में)


वर्ष                  उपलब्धि/सम्मान

1949              रायबरेली के जायस में जन्म
1965-2008     पंडित रामाश्रय झा से शास्त्रीय शिक्षा
1979              'झुलनी का रंगा सांचा' गीत का आकाशवाणी पर प्रथम प्रसारण
1997              आकाशवाणी द्वारा 'ए' ग्रेड (A Grade) की मान्यता
2024              आकाशवाणी द्वारा 'टॉप ग्रेड' (Top Grade) कलाकार का दर्जा
2026              उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (2021 के लिए)

गुरु-शिष्य परंपरा का अनमोल अध्याय

श्रीकांत वैश्य का जन्म 3 मई 1949 को रायबरेली के जायस में हुआ था। पिता मोतीलाल सराफा व्यवसायी थे लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। छह साल की उम्र में चेचक ने उनके जीवन का उजाला छीन लिया। लेकिन जहां रोशनी खत्म हुई, वहीं से सुरों का सफर शुरू हुआ। श्रीकांत की शिक्षा किसी तपस्या से कम नहीं रही। 1958 में प्रयाग संगीत समिति से शुरू हुआ सफर सुनील कुमार डे, नगेंद्र नाथ विश्वास और साधो लाल शर्मा से होता हुआ किराना घराने के दिग्गज पंडित रामाश्रय झा तक पहुंचा।

झा जी से शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखी

झा जी पहले हिचकिचाए कि एक दृष्टिहीन बच्चा कैसे सीखेगा, पर जब श्रीकांत जी ने अपनी विलक्षण स्मरण शक्ति और प्रतिभा का प्रदर्शन किया, तो झा जी ने उन्हें गले लगा लिया। 1965 से 2008 तक उन्होंने झा जी से शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखीं। साथ ही कृपा शंकर तिवारी, पंडित रघुनाथ सेठ और वाई.बी. दीक्षित जैसे मनीषियों ने उन्हें तराशा। आज सैकड़ों की संख्या में श्रीकांत से संगीत सीखे शिष्य भारत ही दुनिया भर में अपनी प्रतिभा दर्शा रहे हैं।

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