शैवाल से 4 गुना अधिक निकलेगा बायोडीजल, MNNIT इलाहाबाद के वैज्ञानिकों ने विकसित की तकनीक, ऊर्जा के क्षेत्र में नई उम्मीद
मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (MNNIT) के वैज्ञानिकों ने शैवाल से बायोडीजल उत्पादन को चार गुना बढ़ाने की तकनीक विकसित ...और पढ़ें

एमएनएनआइटी इलाहाबाद स्थित जैव प्रौद्योगिकी विभाग की प्रयोगशाला में शैवाल से बायोडीजल निर्माण की जानकारी देतीं प्रो. मोनिका प्रकाश राय। जागरण
HighLights
जैव प्रौद्योगिकी विभाग की प्रो. मोनिका राय ने चुंबकीय नैनो कणों का किया प्रयोग
तकनीक का पेटेंट, न्यूट्रास्यूटिकल और फार्मास्युटिकल उद्योग के लिए भी उपयोगी
मृत्युंजय मिश्र, जागरण प्रयागराज। मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआइटी) के वैज्ञानिकों का शोध वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में नई उम्मीद लेकर आया है। संस्थान के जैव प्रौद्योगिकी विभाग की प्रोफेसर मोनिका प्रकाश राय ने सिलिका-लेपित चुंबकीय नैनो कणों की मदद से ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसमें शैवाल से बायोडीजल उत्पादन करीब चार गुना बढ़ाया जा सकता है। साथ ही इस प्रक्रिया से स्वास्थ्य के लिए उपयोगी फैटी एसिड भी बड़ी मात्रा में प्राप्त हो सकते हैं।
ईंधन उत्पादन प्रक्रिया को सरल व प्रभावी बनाया
तकनीक को पिछले वर्ष पेटेंट भी मिल चुका है और इससे संबंधित कई शोधपत्र अंतरराष्ट्रीय जर्नल प्रोडक्ट रिसर्च सहित अन्य जर्नलों में प्रकाशित हुआ है। शैवाल क्लोरेला पाइरेनोइडोसा तेजी से बढ़ने और अधिक मात्रा में लिपिड बनाने की क्षमता के लिए जाना जाता है। यही लिपिड आगे चलकर बायोडीजल में परिवर्तित किया जाता है। शोधकर्ता ने सिलिका-लेपित चुंबकीय नैनो कणों का प्रयोग कर शैवाल कोशिकाओं की कटाई, लिपिड निष्कर्षण और ईंधन उत्पादन की प्रक्रिया को अधिक सरल और प्रभावी बनाया है।
ऊर्जा और लागत दोनों की बचत : प्रो. मोनिका
प्रो. मोनिका राय कहती हैं कि माइक्रोएल्गी आधारित बायोडीजल उत्पादन में सबसे महंगी प्रक्रिया शैवाल कोशिकाओं की कटाई होती है। पारंपरिक तरीकों में यह प्रक्रिया धीमी और अधिक ऊर्जा खपत वाली होती है। हालांकि इस शोध में चुंबकीय सिलिका नैनो कणों के उपयोग से फ्लोक्युलेशन दक्षता लगभग 84 प्रतिशत तक पहुंच गई। चुंबकीय गुणों के कारण इन नैनो कणों को आसानी से अलग किया जा सकता है, जिससे ऊर्जा और लागत दोनों की बचत होती है।
लिपिड बायोडीजल उत्पादन का मुख्य आधार
शोध के दौरान पाया गया कि नैनो कणों की उपस्थिति में शैवाल कोशिकाओं की दीवारें आंशिक रूप से टूट जाती हैं। इससे कोशिकाओं में मौजूद लिपिड आसानी से बाहर निकल आता है। परिणामस्वरूप सामान्य प्रक्रिया की तुलना में इस तकनीक से चार गुना अधिक लिपिड प्राप्त हुआ और यही लिपिड बायोडीजल उत्पादन का मुख्य आधार है।
डीबीटी नई दिल्ली ने महत्वपूर्ण शोध परियोजना सौंपी
प्रो. मोनिका राय को हाल ही में जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) नई दिल्ली ने कार्बन उत्सर्जन की समस्या से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण शोध परियोजना सौंपी है। परियोजना का संचालन एमएनएनआइटी में किया जाएगा तथा यह बीएचयू वाराणसी के साथ संयुक्त रूप से संचालित की जाएगी। शोध के तहत नैनोमटेरियल्स के संश्लेषण, उनके विश्लेषण तथा माइक्रोएल्गी संवर्धन प्रणाली में उनके उपयोग पर अध्ययन किया जाएगा। यह खोज बायोडीजल न्यूट्रास्यूटिकल और फार्मास्युटिकल उद्योग के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है।
अध्ययन में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया
न्यूट्रास्यूटिकल और फार्मास्युटिकल उद्योग के लिए भी उपयोगी प्रो. मोनिका बताती है कि इस अध्ययन में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। नैनो कणों की मौजूदगी में शैवाल से प्राप्त फैटी एसिड में लगभग 80 प्रतिशत लिनोलिक एसिड पाया गया। लिनोलिक एसिड एक आवश्यक ओमेगा-6 फैटी एसिड है, जो मस्तिष्क के कार्य, हृदय स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस कारण यह खोज बायोडीजल के साथ-साथ न्यूट्रास्यूटिकल और फार्मास्युटिकल उद्योग के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है।
ऊर्जा सुरक्षा का नया विकल्प
शोधकर्ता का मानना है कि यदि इस तकनीक को बड़े स्तर पर विकसित किया जाए तो यह भारत जैसे देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा का नया विकल्प बन सकती है। इससे तेल आयात पर निर्भरता कम हो सकती है और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी।
