रेलवे स्टेशनों की अब दिखेगी कॉर्पोरेट पहचान, प्लेटफॉर्म नंबर से पहले जुड़ेगा ब्रांड का नाम; बदलेगा अनाउंसमेंट का तरीका
भारतीय रेलवे ने स्टेशनों पर कॉर्पोरेट पहचान की योजना फिर से शुरू की है, जहां प्लेटफॉर्म नंबर से पहले ब्रांड ...और पढ़ें

प्रयागराज संगम रेलवे स्टेशन। जागरण आर्काइव
HighLights
तंबाकू, शराब या ड्रग्स से जुड़े विज्ञापनों पर रहेगी पूरी पाबंदी, सख्ती से पालन का निर्देश
उत्तर रेलवे के नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से होगी शुरुआत, प्रयागराज संगम पर भी होगा बदलाव
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। भारतीय रेल अब अपने यात्रियों को केवल गंतव्य तक पहुंचाने का माध्यम भर नहीं रहेगी, बल्कि इसके स्टेशन आने वाले दिनों में देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट विज्ञापन केंद्र के रूप में नजर आएंगे। उत्तर रेलवे ने अपने नेटवर्क के व्यस्त और ऐतिहासिक रेलवे स्टेशनों के प्लेटफॉर्म्स के नामकरण अधिकार यानी ''नेमिंग राइट्स'' निजी कंपनियों को सौंपने की प्रक्रिया को नए सिरे से शुरू कर दी है।
बदल जाएगी प्लेटफार्म की पहचान
इस नीति के अमल में आते ही प्लेटफॉर्म की पारंपरिक पहचान बदल जाएगी। यात्री जब स्टेशन पहुंचेंगे, तो उन्हें केवल प्लेटफॉर्म नंबर 1, 2 या 3 नहीं दिखेगा, बल्कि इन नंबरों से ठीक पहले किसी बड़े व्यापारिक ब्रांड या कंपनी का नाम स्पष्ट रूप से जुड़ा नजर आएगा। हालांकि तंबाकू, शराब या ड्रग्स से जुड़े विज्ञापनों पर पूरी तहर पाबंदी रहेगी।
नियमित कमाई जुटाने की तैयारी
यह फैसला रेलवे की उस दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह यात्री किराए और माल ढुलाई पर अपनी आर्थिक निर्भरता को कम करना चाहती है। गैर-किराया राजस्व (Non-Fare Revenue) के जरिए रेलवे अपने खाली पड़े परिसरों, ओवरब्रिज, दीवारों और भारी भीड़ वाले प्लेटफॉर्म्स का व्यावसायिक उपयोग करके हर साल करोड़ों रुपये की नियमित कमाई जुटाने की तैयारी में है।
उद्घोषणा और विज्ञापनों में दिखेगा बदलाव
इस नई व्यवस्था के लागू होने के बाद रेलवे स्टेशनों के अंदर का पूरा दृश्य और ध्वनि वातावरण पूरी तरह बदल जाएगा। जिस भी निजी कंपनी को किसी प्लेटफॉर्म का व्यावसायिक टेंडर आवंटित किया जाएगा, उसे उस पूरे प्लेटफॉर्म पर व्यापक स्तर पर ब्रांडिंग करने की अनुमति दी जाएगी।
सार्वजनिक उद्घोषणा का प्रारूप बदल जाएगा
जब भी कोई ट्रेन प्लेटफॉर्म पर पहुंचेगी या वहां से रवाना होगी, तो पब्लिक एड्रेस सिस्टम पर होने वाली सार्वजनिक उद्घोषणा का प्रारूप बदल जाएगा। सामान्य तौर पर पहले कहा जाता था 'कृपया ध्यान दें, गाड़ी संख्या...प्लेटफॉर्म नंबर 16 पर आ रही है।' अब नए प्रारूप में प्लेटफॉर्म संख्या बोलने से पहले संबंधित कंपनी का नाम बोला जाएगा। जैसे 'कृपया ध्यान दें, गाड़ी संख्या...बैल कोल्हू प्लेटफॉर्म नंबर 16 पर आ रही है।'
प्लेटफॉर्म परिसर की ब्रांडिंग
सिर्फ ऑडियो ही नहीं बल्कि विजुअल स्तर पर भी भारी बदलाव दिखेगा। प्लेटफॉर्म के प्रवेश द्वार, सीढ़ियों की रेलिंग, खंभों, दिशा-सूचक बोर्डों और दीवारों पर उसी कंपनी के रंग, लोगो और प्रचार सामग्री को प्रमुखता से लगाया जाएगा।
यात्रियों का ध्यान आकर्षित होगा
किसी भी सामान्य विज्ञापन बोर्ड की तुलना में रेलवे प्लेटफॉर्म पर यात्रियों का ठहराव (वेटिंग टाइम) बहुत अधिक होता है। ट्रेन की प्रतीक्षा करते समय यात्री स्वाभाविक रूप से चारों तरफ नजर डालते हैं। ऐसे में कंपनियों को सीधे और लंबे समय तक उपभोक्ता का ध्यान अपनी ओर खींचने का बड़ा मौका मिलेगा।
पहले नियम और व्यवस्था कैसी थी?
भारतीय रेल के इतिहास में स्टेशनों और प्लेटफॉर्म्स की पहचान हमेशा से प्रशासनिक और सेवा-आधारित रही है। आजादी के बाद से ही स्टेशनों के प्लेटफॉर्म्स को केवल अंकों (1, 2, 3, 4...) के क्रम में रखा जाता था, ताकि अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे यात्री भी बिना किसी भ्रम के अपनी ट्रेन तक आसानी से पहुंच सकें।
प्लेटफॉर्म पर केवल रेलवे के सूचना पट होते थे
प्लेटफॉर्म पर केवल रेलवे के मानक नीले और सफेद रंग के आधिकारिक सूचना पट लगाए जाते थे। विज्ञापन के लिए स्टेशन परिसर में चुनिंदा दीवारें या तय होर्डिंग्स ही किराए पर दी जाती थीं। किसी भी निजी कंपनी को प्लेटफॉर्म के मुख्य नाम या नंबर के साथ अपना नाम जोड़ने की कतई अनुमति नहीं थी।
उत्तर रेलवे ने पुरानी परंपरा तोड़ी
साल 2022 में उत्तर रेलवे ने इस परंपरा को तोड़ते हुए एक प्रायोगिक परियोजना (पायलट प्रोजेक्ट) की शुरुआत की थी। इस प्रयोग के तहत नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के कुछ प्लेटफॉर्म्स के नामकरण के अधिकार निजी कंपनियों को दिए गए थे। उस समय खाद्य तेल और दैनिक उपभोग की वस्तुएं बनाने वाले बीएल एग्रो समूह ने इसके अधिकार खरीदे थे।
एक वर्ष के अनुबंध से रेलवे को 1 करोड़ की आय
कंपनी ने नई दिल्ली स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 16 के आगे अपने प्रमुख खाद्य तेल ब्रांड ''बैल कोल्हू'' का नाम जोड़ा था, जबकि प्लेटफॉर्म नंबर 14 और 15 के नाम के साथ अपने दूसरे उत्पाद ''नरिश'' का नाम लगाया गया था। इसके बाद एक प्रमुख फुटवियर (जूता निर्माता) कंपनी ने भी कुछ प्लेटफॉर्म्स के राइट्स हासिल किए थे। इस एक वर्ष के अनुबंध से रेलवे को लगभग एक करोड़ रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई थी।
योजना रोकी, रेल मंत्री हुए थे नाराज
साल 2022 के सफल वित्तीय प्रयोग के बावजूद यह योजना अचानक विवादों के घेरे में आ गई थी। जब देश के सबसे प्रमुख स्टेशन पर खाद्य तेल और जूतों के नाम प्लेटफॉर्म के साथ सुनाई देने लगे, तो कई हलकों में इस पर कड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। यात्रियों और विश्लेषकों ने सवाल उठाया कि क्या राजस्व कमाने की होड़ मेंरेलवे अपनी ऐतिहासिक विरासत और मर्यादा को पीछे छोड़ रहा है? मामला जब रेल मंत्रालय तक पहुंचा, तो तत्कालीन रेल मंत्री ने इस पूरी प्रक्रिया पर गहरी नाराजगी व्यक्त की थी।
स्टेशनों की गरिमा व यात्रियों की सुविधा सर्वोपरि
मंत्रालय का सख्त रुख था कि किसी भी कंपनी को महज पैसे के दम पर प्लेटफॉर्म के अधिकार नहीं सौंपे जा सकते। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व वाले स्टेशनों की अस्मिता, गरिमा और यात्रियों की सुविधा सबसे ऊपर होनी चाहिए।
सभी टेंडर निरस्त कर दिए गए थे
चिंता इस बात की भी थी कि कहीं असंवेदनशील या अनुचित उत्पादों का प्रचार स्टेशनों की सार्वजनिक छवि को नुकसान न पहुंचाए। इसके अलावा यह आशंका भी जताई गई कि ऑडियो अनाउंसमेंट में बार-बार कंपनियों के लंबे नाम आने से सामान्य यात्रियों, बुजुर्गों और ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोगों में ट्रेन के प्लेटफॉर्म को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है। इसी नाराजगी और आपत्तियों के चलते रेलवे बोर्ड ने आनन-फानन में इस पूरी योजना पर रोक लगा दी थी और भविष्य के सभी टेंडर तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिए गए थे।
दो वर्ष बाद योजना फिर शुरू करने का फैसला
लगभग दो साल तक ठंडे बस्ते में रहने और व्यापक नीतिगत समीक्षा के बाद रेलवे प्रशासन ने अब इस योजना को दोबारा धरातल पर उतारने का फैसला किया है। रेलवे बोर्ड और उत्तर रेलवे के अधिकारियों ने विज्ञापनों और ब्रांडिंग के लिए सख्त दिशा-निर्देश और स्पष्ट सीमाएं तय की हैं।
कड़े मानक लागू किए गए हैं
नए नियमों के अनुसार स्टेशन का मूल और ऐतिहासिक नाम पूरी तरह अपरिवर्तित रहेगा। किसी भी शहर या स्टेशन के नाम के साथ छेड़छाड़ नहीं होगी। ब्रांडिंग का अधिकार केवल प्लेटफॉर्म के स्तर तक सीमित रहेगा। इसके साथ ही टेंडर में शामिल होने वाली कंपनियों के चयन में भी कड़े मानक लागू किए गए हैं, ताकि किसी भी विवादित श्रेणी के उत्पाद का प्रचार न हो सके।
इन स्टेशनों पर दिखेगा बदलाव
उत्तर रेलवे ने अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और जम्मू के सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशनों की सूची तैयार की है। इन चिन्हित स्टेशनों के प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के लिए निजी कंपनियों से बोलियां (टेंडर) आमंत्रित की जा रही हैं।
प्रयागराज संगम (उत्तर प्रदेश): कुंभ और माघ मेले के दौरान देश भर से आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं के कारण यह स्टेशन ब्रांड्स के लिए सबसे बड़ा केंद्र है।
वाराणसी कैंट (उत्तर प्रदेश): पूर्वांचल और बिहार का मुख्य प्रवेश द्वार, जहां पर्यटकों और तीर्थयात्रियों का भारी दबाव पूरे साल बना रहता है।
लखनऊ जंक्शन/चारबाग (उत्तर प्रदेश): प्रदेश की राजधानी होने के नाते यहां प्रशासनिक, कॉर्पोरेट और सामान्य यात्रियों का भारी आवागमन रहता है।
बरेली जंक्शन व मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश): पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र।
मेरठ सिटी व सहारनपुर (उत्तर प्रदेश): राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से सटे घनी आबादी और व्यापारिक आवागमन वाले स्टेशन।
अंबाला छावनी (हरियाणा): उत्तर भारत का प्रमुख रेलवे जंक्शन, जो पंजाब, हरियाणा और हिमाचल को जोड़ता है।
जम्मूतवी (जम्मू-कश्मीर): माता वैष्णो देवी और कश्मीर घाटी जाने वाले लाखों पर्यटकों का मुख्य रेलवे केंद्र।
आय से स्टेशनों पर यात्री सुविधाएं बढ़ाई जाएंगी
रेलवे प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि प्लेटफॉर्म्स के नामकरण से अर्जित होने वाले गैर-किराया राजस्व को सामान्य बजट में खपाने के बजाय सीधे स्टेशन के विकास में लगाया जाएगा।
उत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (सीपीआरओ) हिमांशु शेखर उपाध्याय के अनुसार, रेलवे अपनी पारंपरिक आय से इतर नए और आधुनिक आर्थिक मॉडल अपना रहा है। निजी कंपनियों से मिलने वाले इस राजस्व का मुख्य उद्देश्य स्टेशनों पर यात्री सुविधाओं का स्तर बढ़ाना है।
यात्रियों को होगी सुविधा
इस धन का उपयोग सीधे तौर पर स्टेशनों पर निम्नलिखित सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए किया जाएगा।
प्रतीक्षालय और बैठने की जगह: प्लेटफॉर्म्स पर यात्रियों के बैठने के लिए आधुनिक और आरामदायक बेंचों की संख्या बढ़ाई जाएगी।
स्वच्छता और पेयजल: प्लेटफॉर्म्स पर चौबीसों घंटे शुद्ध और ठंडा पेयजल उपलब्ध कराने वाले नए वाटर वेंडिंग कियोस्क लगाए जाएंगे और शौचालयों का आधुनिकीकरण होगा।
आधुनिक आवागमन: बुजुर्गों, महिलाओं और दिव्यांग यात्रियों की सहूलियत के लिए नए एस्केलेटर (स्वचालित सीढ़ियां) और लिफ्ट लगाई जाएंगी।
आधुनिक डिस्प्ले बोर्ड: प्लेटफॉर्म्स पर मल्टी-कलर एलईडी ट्रेन इंडिकेटर और कोच गाइडेंस डिस्प्ले सिस्टम को और ज्यादा स्पष्ट बनाया जाएगा, ताकि किसी भी यात्री को डिब्बे तलाशने में परेशानी न हो।
मेट्रो मॉडल से रेल का मेल
देश के बड़े महानगरों जैसे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और नोएडा की मेट्रो प्रणालियों में स्टेशनों के कॉर्पोरेट नामकरण का फॉर्मूला पिछले एक दशक से बेहद सफल रहा है। दिल्ली मेट्रो में ''हुडा सिटी सेंटर'', ''विश्वविद्यालय'' या ''आईआईटी'' जैसे स्टेशनों के आगे निजी कंपनियों के नाम जुड़ चुके हैं और यात्री इसके पूरी तरह अभ्यस्त हो चुके हैं। भारतीय रेलवे अब उसी आधुनिक व्यावसायिक ढांचे को अपने नेटवर्क पर लागू कर रही है। जहां मेट्रो में यात्री औसतन दो से पांच मिनट रुकता है, वहीं भारतीय रेल के प्लेटफॉर्म पर यात्री आधा घंटा से लेकर दो घंटे तक का समय बिताता है।
क्या होगा असर?
इस बड़े समय-अंतराल का लाभ उठाकर रेलवे अपनी तिजोरी भरेगी और निजी ब्रांड्स को सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचने का एक मजबूत मंच मिलेगा। आने वाले दिनों में देश के रेलवे प्लेटफॉर्म अब केवल पटरियों और ट्रेनों के लिए नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट चमक-दमक के लिए भी जाने जाएंगे।
