रेलवे में अब एक ही नेटवर्क से जुड़ेंगे 40 हजार स्मार्ट सेंसर, AI रोकेगा हादसे
भारतीय रेलवे अब अपने पूरे नेटवर्क को सुरक्षित बनाने के लिए 'सी-डाट कॉमन सर्विस प्लेटफॉर्म' के तहत 40,000 स्मार्ट सेंसर ...और पढ़ें

उत्तर रेलवे के जम्मू मंडल से लेकर लखनऊ मंडल के प्रयागराज संगम तक होगा लाभ। जागरण
HighLights
40,000 स्मार्ट सेंसर अब एक केंद्रीय स्वदेशी प्लेटफॉर्म से जुड़ेंगे।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग से तकनीकी गड़बड़ी का तुरंत पता चलेगा।
समय पर अलर्ट भेजकर रेलवे हादसों को रोकेगा और यात्रा सुरक्षित बनाएगा।
अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज। भारतीय रेल अपने पूरे नेटवर्क को सुरक्षित और हाईटेक बनाने के लिए बड़ा तकनीकी कदम उठाने जा रहा है। रेलवे ने इंटरनेट आफ थिंग्स (आइओटी) परियोजनाओं के लिए स्वदेशी ''सी-डाट कामन सर्विस प्लेटफार्म'' (सीसीएसपी) को औपचारिक मंजूरी दे दी है। अब तक ट्रेनों के इंजन, कोच, पहियों, पटरियों, ओवरहेड बिजली तारों और सिग्नलों पर अलग-अलग कंपनियों के सेंसर लगाए जाते थे।
हर कंपनी का अपना अलग साफ्टवेयर होता था और आपस में तालमेल न होने के कारण इनका डेटा एक जगह इकट्ठा नहीं हो पाता था। नतीजा यह था कि खराबी आने के बाद ही रेलकर्मियों को उसकी जानकारी मिलती थी, जिससे हादसों का जोखिम बना रहता था और ट्रेनें भी लेट होती थीं। नए आदेश के तहत देश भर में लगे विभिन्न कंपनियों के 40 हजार स्मार्ट सेंसर अब एक ही केंद्रीय स्वदेशी प्लेटफार्म से जोड़ दिए जाएंगे।
यह नया सिस्टम बहुत सरल तरीके से काम करेगा। पटरी, पहिए, इंजन, एक्सल या सिग्नल पर लगा सेंसर किसी भी तकनीकी गड़बड़ी को तुरंत पहचान लेगा। जैसे ही किसी पहिए का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ेगा (हाट एक्सल), पटरी में मौसम के कारण बारीक फ्रैक्चर दिखेगा, कोच के सस्पेंशन में असामान्य कंपन पैदा होगा या सिग्नल का रिले बाक्स तय वोल्टेज से भटकेगा, सेंसर यह जानकारी इंटरनेट गेटवे के जरिए पलक झपकते रेलवे के मुख्य सर्वर पर भेजेगा।
सर्वर पर मौजूद ''आईआर-नियंत्रक'' सिस्टम में लगा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) और मशीन लर्निंग (एमएल) इस पूरे डेटा को डिकोड करेगा। यहां मशीन लर्निंग (एमएल) पुरानी लाखों यात्राओं के रिकार्ड और सामान्य व्यवहार को याद रखकर सीखती है। एमएल तुरंत समझ जाएगी कि कोई पुर्जा कितनी देर में पूरी तरह टूट सकता है या फेल हो सकता है।
उदाहरण के तौर पर, अगर किसी पहिए में हल्का कंपन शुरू हुआ, तो एमएल सिस्टम अपनी पुरानी सीख से यह पहले ही भांप लेगा कि अगले 50 किलोमीटर में यह हाट एक्सल बन सकता है या पटरी से उतरने का कारण बन सकता है। किसी उपकरण के अचानक पूरी तरह खराब होने से पहले ही सिस्टम कंट्रोल रूम, स्टेशन मास्टर और लोको पायलट की स्क्रीन पर अलर्ट भेज देगा।
इससे ट्रेन को अगले स्टेशन पर पहले ही रोककर या गति नियंत्रित कर समय रहते मेंटेनेंस कर लिया जाएगा। रेलवे बोर्ड के निदेशक/एमई (सीएंडआईएस) भारत भूषण हरित के अनुसार 71.73 करोड़ रुपये की इस परियोजना के लिए हार्डवेयर, इलेक्ट्रिकल सुविधाएं और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर की व्यवस्था पांच वर्षों के लिए प्रस्तावित और स्वीकृत की गई है।
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साइबर सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इसका मुख्य डेटा सेंटर दिल्ली में और बैकअप सेंटर सिकंदराबाद में बनेगा। इससे निगरानी कभी बंद नहीं होगी, सिग्नल व ट्रैक फेलियर रुकेंगे और सफर पूरी तरह सुरक्षित बनेगा। यह परियोजना उत्तर रेलवे और रेलवे की आईटी संस्था ''क्रिस'' के जरिए जमीन पर उतारी जा रही है। इससे उत्तर रेलवे के जम्मू मंडल से लेकर लखनऊ रेल मंडल के फाफामऊ, प्रयाग और संगम स्टेशन तक सुरक्षा तंत्र मजबूत होगा।
