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इलाहाबाद हाई कोर्ट की पहल से मुस्कुराया परिवार, बच्चों का प्यार और पति के आश्वासन पर एक हुए दंपति

Published: Tue, 06 Oct 2026 12:38 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद में बच्चों के कल्याण को प्राथमिकता देते हुए पति-पत्नी को फिर से मिलाया, ...और पढ़ें

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HighLights

  1. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद में बच्चों के कल्याण पर दंपति को मिलाया।

  2. चार सरकारी अधिकारियों पर अवमानना के आरोप तय, आदेश अनुपालन न करने पर।

  3. कांस्टेबल की दूसरी शादी याचिका खारिज, केजीएमयू प्रोफेसर की सभी याचिकाएं निरस्त।

जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक वैवाहिक विवाद का अंत सुखद रहा। नाबालिग बच्चों की कस्टडी से जुड़ी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने सुलह के आधार पर निस्तारित कर दी। कोर्ट ने कहा- ‘नाबालिगों की कस्टडी में सर्वोपरि विचार उनका कल्याण है।

दोनों पक्षों की सहमति, बच्चों की पिता के साथ सहजता और पति के आश्वासन के बाद इस याचिका पर आगे सुनवाई की आवश्यकता नहीं है। लगभग 85 हजार मासिक वेतन पाने वाले याची शिक्षक पति ने अपनी पत्नी, 11 वर्षीय पुत्र व पांच वर्षीय पुत्री की कस्टडी के लिए याचिका दाखिल की थी।

आगरा निवासी दंपती विवाद के चलते अलग रह रहे थे। फैमिली कोर्ट में तलाक का वाद भी लंबित है। पीठ ने 17 अगस्त 2026 की सुनवाई में याची को स्कूल की छुट्टियों और अवकाश के दौरान बच्चों की अस्थायी कस्टडी दी थी। साथ ही हर रविवार सुबह 10 बजे से शाम छह बजे तक बच्चों से मिलने और उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर ले जाने की अनुमति दी थी।

याची ने 28 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया कि उसने आदेश का पालन करते हुए नियमित रूप से बच्चों से मुलाकात की। बच्चों को साथ में घुमाने ले गया, जहां बच्चे उसके साथ सहज रहे। उसने कोर्ट में पत्नी और बच्चों के साथ वैवाहिक घर में फिर से रहने की इच्छा दोहराई। कोर्ट ने दोनों बच्चों से अलग से बातचीत की।

दोनों ने कहा- पिता का साथ रहना अच्छा लगा। कोर्ट ने पाया कि बच्चों की बात में पिता को लेकर डर या असहजता नहीं है। फिर कोर्ट ने पत्नी की राय जानी। उन्होंने कहा कि बच्चों के कल्याण और समग्र भलाई को देखते हुए वह पति के साथ वैवाहिक घर में फिर से रहने को तैयार हैं, बशर्ते उन्हें सम्मान और गरिमा के साथ रखा जाए।

याची ने कोर्ट में शपथ-पत्र देकर आश्वासन दिया कि वह पत्नी को सम्मान के साथ रखेगा, बच्चों की अच्छी शिक्षा की व्यवस्था करेगा। ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा, जिससे पत्नी को शिकायत हो।


हाई कोर्ट ने अवमानना मामले में चार वरिष्ठ अधिकारियों पर तय किए आरोप
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने चार वर्ष पुराने आदेश का अनुपालन न करने के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार के चार वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ अवमानना के आरोप तय किए हैं।

कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों की ओर से ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया, जिससे 19 जुलाई 2022 के आदेश का आंशिक अनुपालन भी साबित हो सके। पीठ ने प्रथमदृष्टया माना कि अधिकारी रिट कोर्ट के आदेश का पालन करने के इच्छुक नहीं दिख रहे हैं।

न्यायमूर्ति सौरभ लवानिया की पीठ ने सुरेश चंद्र वर्मा के मामले में वर्ष 2022 में दिए फैसले के अनुपालन से जुड़ी 37 अवमानना याचिकाओं पर यह कार्रवाई की। उस फैसले में लागू शासनादेशों के तहत लाभ देने संबंधी आदेश निरस्त करते हुए वेतन का पुनर्निर्धारण, बकाया वेतन का भुगतान और संशोधित पेंशन भुगतान आदेश जारी करने का निर्देश दिया गया था।

चार माह में लाभ न देने पर सात प्रतिशत साधारण ब्याज देने को भी कहा गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चार वर्ष बीतने के बाद भी आदेश का अनुपालन नहीं हुआ। आरोप वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार, नमामि गंगे एवं ग्रामीण जलापूर्ति-लघु सिंचाई विभाग के प्रमुख सचिव अनुराग श्रीवास्तव, सिंचाई विभाग के प्रमुख सचिव अनिल गर्ग और ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के प्रमुख सचिव सौरभ बाबू पर तय किए गए हैं।

कोर्ट ने सरकार की और समय देने की अर्जी भी खारिज कर दी। पीठ ने कहा कि आदेश विशेष अपील में बरकरार रहा और 13 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने भी इसकी पुष्टि कर दी। राज्य की पुनर्विचार याचिकाएं भी खारिज हो चुकी हैं।

कोर्ट ने 22 मई को महाधिवक्ता के आठ सप्ताह में अनुपालन के आश्वासन के बावजूद प्रगति न होने पर नाराजगी जताई। अपर महाधिवक्ता अनुज कुदेसिया और अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता सुनील बाजपेयी भी अनुपालन का ठोस दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके।

पीडब्ल्यूडी के अपर मुख्य सचिव अजय चौहान पर आरोप अगली सुनवाई में तय होंगे। सभी आरोपितों को एक सप्ताह में जवाब दाखिल करने और 13 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है।

तलाक बिना दूसरी शादी करने वाली कांस्टेबल की याचिका खारिज
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956 के नियम 29 के उल्लंघन पर बड़ी विभागीय कार्रवाई को वैध ठहराया है। न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने महिला कांस्टेबल विनीता कुमारी की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इस नियम के तहत केवल लघु दंड नहीं, बल्कि बड़ा दंड भी दिया जा सकता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड की मात्रा साक्ष्य और परिस्थितियों के आधार पर तय होती है, न कि जांच किस उप-नियम के तहत हुई है। यदि जांच में बड़े दंड की आवश्यकता दिखती है, तो प्राधिकारी को नियम 14(1) की प्रक्रिया अपनानी होगी, लेकिन इसका उलटा आवश्यक नहीं है।

याची के खिलाफ 22 मार्च 2025 को आरोप-पत्र जारी किया गया था। आरोप था कि उसने पहले पति को तलाक दिए बिना दुर्गेश कुमार गौतम से विवाह कर लिया, जो नियम का उल्लंघन है। विनीता ने आरोप-पत्र रद करने और आगे की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की थी।

याची के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि नियम 29(3) के अनुसार इस उल्लंघन पर न्यूनतम सजा तीन वर्ष की वेतन-वृद्धि रोकना है, जो लघु दंड है। इसलिए उन्होंने कहा कि कार्रवाई नियम 14(2) के तहत होनी चाहिए। राज्य के स्थायी अधिवक्ता ने बताया कि नियम 29 का उप-नियम (3) 1976 में हटा दिया गया था, इससे नियुक्ति प्राधिकारी को लघु या बड़े दंड देने का विवेक प्राप्त हो गया है। याची द्वारा उद्धृत फैसले 1976 के संशोधन पर विचार नहीं करते हैं और इसलिए वे बाध्यकारी नहीं हैं।

न्यायिक प्रक्रिया बाधित करने की कोशिश, हाई कोर्ट ने केजीएमयू प्रोफेसर की सभी याचिकाएं कीं खारिज
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के प्रोफेसर आशीष वाखलू की सेवा समाप्ति समेत सभी रिट याचिकाएं और अवमानना याचिका खारिज कर दीं। न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने विभिन्न याचिकाओं पर एक साथ फैसला सुनाते हुए उनके आचरण पर कड़ी टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा कि प्रोफेसर ने अपने खिलाफ लगाए गए मुख्य आरोपों का सामना करने के बजाय प्रक्रियाओं का सहारा लेकर न्यायिक प्रक्रिया को विफल करने की कोशिश की। पीठ ने उनके आचरण को दुर्भावनापूर्ण बताते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण न्यायिक उपचार उन लोगों के लिए है, जिनके वैधानिक या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ हो।

प्रक्रियागत त्रुटियों को आधार बनाकर न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने के लिए इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने अवमानना याचिका भी खारिज करते हुए कहा कि अंतरिम आदेश के विरुद्ध रिकाल तथा याचिका को निष्प्रभावी मानकर खारिज करने के आवेदन दाखिल किए गए थे। इन पर निर्णय नहीं हो सका था, इसलिए आदेश की अवहेलना का आधार नहीं बनता।

केजीएमयू ने 10 जून 2020 को वित्तीय अनियमितता, वित्तीय एवं प्रशासनिक ईमानदारी का पालन न करने और धन के गबन के आरोपों के बाद विभागीय जांच की थी। जांच के बाद वाखलू को सेवा से हटा दिया गया था। इस प्रकरण में उन्होंने शुरुआत से अब तक कुल पांच याचिकाएं दाखिल की थीं।

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