इलाहाबाद हाई कोर्ट: मूल कर्ज से दोगुनी राशि वसूली संबंधी रोक वाले आदेश पर HC ने अंतरिम रोक लगाई
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सहकारी बैंकों को मूल कर्ज से दोगुनी राशि से अधिक वसूली पर रोक लगाने वाले एकलपीठ के आदेश पर अंतरिम स्थगन दिया है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट।
HighLights
उप्र सहकारी ग्राम विकास बैंक लिमिटेड की विशेष अपील पर हाई कोर्ट ने दिया आदेश
एकलपीठ ने याचिकाएं निस्तारित करते हुए कुछ गंभीर मुद्दों पर स्वत: संज्ञान लिया था
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें सहकारी बैंकों को मूल कर्ज से दोगुनी राशि से अधिक वसूली से रोक दिया गया था। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने 22 जुलाई को यह आदेश दिया था। यह अंतरिम रोक मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक लिमिटेड की विशेष अपील पर लगाई है।
एकलपीठ ने जांच को कमेटी गठित करने को कहा था
एकलपीठ ने महोबा के बैजनाथ व 15 अन्य की याचिकाएं निस्तारित करते हुए कुछ गंभीर मुद्दों पर स्वत: संज्ञान लिया था और व्यापक जांच के लिए कमेटी गठित करने का निर्देश दिया था। यह भी निर्देश दिया था कि कमेटी की कार्यवाही पूरी होने तक किसी भी कर्जदार से मूल कर्ज से दोगुनी राशि से अधिक वसूली न की जाए और किस्तों में भुगतान के अनुरोध पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाए।
बैंक ने विशेष अपील में आदेश को चुनौती दी थी
बैंक ने इस आदेश को विशेष अपील में चुनौती देते हुए कहा कि कर्जदार कोर्ट में केवल किस्तों में भुगतान की मांग लेकर आया था, लेकिन एकलपीठ ने याचिका के दायरे से बाहर जाकर पूरे प्रदेश के लिए ऐसी रोक लगा दी, जो कानून के विपरीत है। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों यथा वीके मजोत्रा बनाम यूनियन आफ इंडिया (2003) सोम मित्तल बनाम कर्नाटक सरकार, एम पुरंदरा व अन्य बनाम महादेशा का हवाला दिया।
खंडपीठ ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया
बैंक के अनुसार दामदुपट नियम ( इसमें ब्याज की रकम मूलधन से ज्यादा नहीं हो सकती, चाहे समय कितना भी हो) पर हाई कोर्ट की खंडपीठ साहब सिंह बनाम कलेक्टर हरदोई मामले में पहले ही विचार कर चुकी है। खंडपीठ ने कहा कि कोर्ट द्वारा स्वत: संज्ञान लेकर कमेटी गठित करने में प्रथम दृष्टया कुछ गलत नहीं लगता, क्योंकि विभाग ने खुद 16 मई 2026 को कमेटी बनाई थी और एडिशनल एडवोकेट जनरल की मदद से सुनवाई हुई थी, लेकिन जब तक कानून मौजूद है, कर्ज अनुबंध और लागू कानूनों के तहत वसूली पर रोक नहीं लगाई जा सकती। मामले में विचार की आवश्यकता बताते हुए खंडपीठ ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है।
यह है पूरा मामला
बैजनाथ ने दो भैंस खरीदने के लिए 50 हजार रुपये का लोन लिया था। बैंक ने 13 प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर लोन स्वीकृत किया। पांच नवंबर 2009 को अनुबंध हुआ और छह नवंबर 2009 व 15 फरवरी 2010 को 25-25 हजार की दो किस्तों में राशि जारी हुई। भुगतान पांच साल में होना था। सुरक्षा के तौर पर 0.882 हेक्टेयर जमीन गिरवी रखी गई। याची ने केवल तीन हजार रुपये (बैंक के नए विवरण में 2500 रुपये) लौटाए। बैंक ने 2018 से 2022 तक ओटीएस योजना के लाभ के लिए नोटिस भी दिया था। कर्ज न चुकाने पर राशि बढ़कर 10 मार्च 2026 को याचिका दायर करने तक 3,49,862 रुपये हो गई।
