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'पुलिस खुद को ही कानून समझ रही है...', अवैध हिरासत को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट की फटकार

By Jagran NewsEdited By: Sachin Sharma
Published: Sat, 17 Oct 2026 09:12 AM (IST)Updated: Sat, 17 Oct 2026 09:24 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने औपचारिक गिरफ्तारी से पहले एक व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखने पर उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है।

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HighLights

  1. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी पुलिस को अवैध हिरासत पर फटकारा।

  2. कोर्ट ने कहा, 'पुलिस खुद को ही कानून मान रही है'।

  3. डीजीपी को पुलिस प्रशिक्षण सुधारने के निर्देश दिए गए।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने औपचारिक गिरफ्तारी से पहले एक व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखने पर उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस खुद को ही कानून मानकर काम कर रही है।

7 अक्टूबर के अपने आदेश में अदालत ने नोएडा के एसीपी कमलेश कांत और जांच अधिकारी अनुज कुमार को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की प्रक्रियाओं से पूरी तरह अनभिज्ञ करार दिया और वैधानिक आवश्यकताओं के प्रति उनके रवैये की आलोचना की।

अदालत ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि वे पुलिस अधिकारियों को नागरिक स्वतंत्रता और गिरफ्तारी या हिरासत से पहले अपनाई जाने वाली कानूनी प्रक्रियाओं के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए बेहतर प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करें।

यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने दीपक की पुलिस हिरासत को अवैध ठहराते हुए उसकी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार कर लिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।

हाई कोर्ट ने नोट किया कि एफआईआर दर्ज होने से पहले ही दीपक पुलिस हिरासत में था और बाद में उसे हिरासत में रहते हुए ही औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाया गया।

अदालत ने कहा कि पहली नजर में यह एक मजबूत मामला बनता है कि संबंधित दस्तावेज बाद में भरे गए थे और याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर एक खाली कागज पर लिए गए थे, जिसे बाद में जांच अधिकारी अनुज कुमार द्वारा हस्ताक्षरित किया गया और गिरफ्तारी के आधार भरने वाला हिस्सा खाली छोड़ दिया गया।

हाई कोर्ट ने कहा कि, यह मामला उत्तर प्रदेश पुलिस में व्याप्त दयनीय स्थिति को दर्शाता है। इस अदालत के समक्ष बार-बार ऐसे मामले आए हैं जिनमें कानून की सख्त प्रक्रियाओं और आवश्यकताओं का अक्षरशः पालन नहीं किया गया है।

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