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सर्विस के 14 साल बाद नियुक्ति अवैध करार, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 13 साल पुराना निर्णय किया रद

By Jagran NewsEdited By: Shiv Govind Mishraa
Published: Sat, 17 Oct 2026 12:36 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी जिला अदालत में तृतीय श्रेणी कर्मचारी की नियुक्ति से संबंधित 13 साल पुराने एकलपीठ के आदेश को रद्द कर दिया है।

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HighLights

  1. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 13 साल पुराना आदेश रद्द किया।

  2. चयन सूची की वैधता एक साल से अधिक नहीं हो सकती।

  3. कर्मचारी को 14 साल की सेवा के कारण वेतन वापसी नहीं।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी जिला अदालत में तृतीय श्रेणी कर्मचारी की नियुक्ति को लेकर 13 साल पुराने एकलपीठ के आदेश को गलत ठहराते हुए रद कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि चयन सूची की आयु एक साल से अधिक नहीं हो सकती। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने जिला जज वाराणसी बनाम आनंद कुमार वर्मा की विशेष अपील स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया है।

वाराणसी जिला न्यायालय में तृतीय श्रेणी पदों के लिए पांच जून 1993 को अखबार में विज्ञापन प्रकाशित हुआ। लिखित परीक्षा 22 अप्रैल 1994 को हुई और 18 जून 1994 को चयन सूची बनी। जिला जज ने 18 अक्टूबर 1995 को आदेश दिया कि यूपी अधीनस्थ सिविल कोर्ट मिनिस्टीरियल एस्टेब्लिशमेंट रूल्स 1947 के नियम 14(3) के तहत सूची की वैधता एक साल है, इसलिए 17 जून 1995 के बाद सूची स्वतः समाप्त हो गई। इसी बीच तदर्थ कर्मचारियों की याचिका पर हाई कोर्ट ने आद्या प्रसाद मिश्रा केस 1994 के आधार पर नियमितीकरण का निर्देश दिया, जिससे रिक्त पद भर गए।

जिला जज को नियुक्ति देने का आदेश

चयन सूची के अभ्यर्थी मनोज श्रीवास्तव आदि ने याचिका दायर की, जिस पर एकल जज ने 30 नवंबर 1995 को सूची को तीन साल तक वैध माना। बाद में आनंद कुमार वर्मा ने याचिका दायर कर नियुक्ति मांगी। एकलपीठ ने दो मार्च 2012 को याचिका स्वीकार कर जिला जज को नियुक्ति देने का आदेश दिया।

इसके अनुपालन में आनंद को नियुक्ति मिली और वह 14 साल से सेवा में हैं और अब सेवानिवृत्ति के करीब हैं। जिला जज ने इस आदेश को विशेष अपील में चुनौती दी। कहा कि फुल बेंच ने देवेंद्र नाथ श्रीवास्तव केस 1996 में साफ किया है कि चयन सूची एक साल बाद स्वतः समाप्त हो जाती है।

प्रशासनिक परिपत्र 28 जुलाई 1994 में इसे तीन साल किया गया था, लेकिन वह एक मार्च 1997 को वापस ले लिया गया। परिपत्र नियम पर भारी नहीं हो सकता। खंडपीठ ने माना कि एकलपीठ ने आद्या प्रसाद मिश्रा केस के आधार पर जो नियुक्ति का आदेश दिया, वह विधि की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है।

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फुल बेंच का निर्णय बाध्यकारी है। भविष्य की रिक्तियों पर चयन सूची के अभ्यर्थी का कोई अधिकार नहीं बनता। वैसे कोर्ट ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा है कि आनंद वर्मा ने 14 साल सेवा की है और सेवानिवृत्ति के निकट हैं, इसलिए उन्हें दिया गया वेतन और भत्ते वापस नहीं लिए जाएंगे।