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'राज्य में पुलिस की हालत बेहद खराब, अफसर समझते हैं कुछ भी कर बच निकलेंगे', इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी

Published: Thu, 08 Oct 2026 01:58 AM (GMT+05:30)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा के सहायक पुलिस आयुक्त और थानाध्यक्ष को एक व्यक्ति की अवैध हिरासत के मामले में ...और पढ़ें

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HighLights

  1. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा पुलिस अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई।

  2. अवैध हिरासत मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।

  3. कोर्ट ने याची दीपक को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।

जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने नोएडा के सहायक पुलिस आयुक्त और थानाध्यक्ष को कड़ी फटकार लगाते हुए बीते सोमवार को यहां तक कह दिया कि ‘आपको शर्म आनी चाहिए।’ थाना फेज-2 में दर्ज मामले में आरोपित दीपक नामक व्यक्ति की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने कहा कि इस राज्य में पुलिस की हालत बेहद खराब है।

अधिकारियों को लगता है कि वे कुछ भी कर सकते हैं और बच निकलेंगे। अदालत ने गैरकानूनी हिरासत को देखते हुए याचिका स्वीकार कर ली और याची को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।अभियोजन के अनुसार, 23 अगस्त को दो समूहों के बीच हिंसा हुई। इस घटना में दीपक और चार अन्य लोगों को शाम 7:34 बजे बीएनएस की विभिन्न धाराओं में हिरासत में लिया गया।

एफआईआर रात 9:39 बजे दर्ज की गई। याची के अनुसार, वह प्राथमिकी दर्ज होने से पहले ही पुलिस हिरासत में था और बाद में उसे उसी एफआइआर में औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाया गया। एफआइआर में कई व्यक्तियों के नाम थे, जबकि दीपक का कहना था कि उसमें उसका नाम नहीं था और उसकी कोई विशिष्ट भूमिका नहीं बताई गई थी।

कोर्ट ने कहा कि सवाल यह उठता है कि याची को बीएनएसएस की धारा 126 और 170 के तहत हिरासत में लेने से पहले जो नोटिस जारी किया जाना चाहिए था, वह हिरासत में लेने के बाद कैसे जारी किया गया। इस प्रश्न का उत्तर केवल सहायक पुलिस आयुक्त-प्रथम ही दे सकते हैं। गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी ने गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को यह सूचित नहीं किया कि पूछताछ के दौरान उन्हें अपनी पसंद के वकील से मिलने का अधिकार है।

याचिका में आरोप है कि दीपक 23 अगस्त से ही हिरासत में था और 24 अगस्त को उसकी रिहाई का आदेश पारित होने के बावजूद उसे कभी भी शारीरिक रूप से रिहा नहीं किया गया। याचिका में पुलिस रिकार्ड में दर्ज घटनाक्रम के आधार पर उसकी गिरफ्तारी, निरंतर हिरासत और बाद में रिमांड की वैधता को चुनौती दी गई थी।

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