इलाहाबाद हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी- आपराधिक अपीलों में स्थगन से जज 'ग्लोरीफाइड क्लर्क' जैसे
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आपराधिक अपीलों में पेपर बुक न मिलने के नाम पर स्थगन मांगने की प्रवृत्ति पर कड़ी नाराजगी जताई है।
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HighLights
आपराधिक अपीलों में स्थगन मांगने की प्रवृत्ति पर हाई कोर्ट नाराज।
न्यायाधीशों को 'ग्लोरीफाइड क्लर्क' जैसा व्यवहार बताया कोर्ट ने।
पेपर बुक की जानकारी वेबसाइट पर देने का सुझाव दिया।
विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आपराधिक अपीलों में पेपर बुक नहीं मिलने के नाम पर स्थगन मांगने की प्रवृत्ति पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। कहा है कि इससे कोर्ट की गरिमा गिरती है और जज को जैसे ग्लोरीफाइड क्लर्क (महिमामंडित लिपिक) की तरह पूछताछ काउंटर पर बैठना पड़ रहा है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति पदम नारायण मिश्र की खंडपीठ ने बदायूं निवासी कप्तान व नरेश की आपराधिक अपीलों की सुनवाई के दौरान स्थगन मांगे जाने पर की है।
दोनों अपीलें आठ जुलाई को सूचीबद्ध थीं। कोर्ट ने पेपर बुक तैयार करने और 21 जुलाई को सुनवाई का आदेश दिया। आर्डरशीट (21 जुलाई) में उल्लेख था कि पेपर बुक तैयार हो गई है। इसके बाद 27 जुलाई और पांच अगस्त को वकील के अनुरोध पर स्थगन हुआ।
केवल स्थगन लेने का बहाना: कोर्ट
हाल ही में 22 सितंबर को केस सीरियल नंबर 16 पर लगा तो नरेश के वकील ने कहा कि पेपर बुक नहीं मिली। इस पर कोर्ट ने कहा कि पेपर बुक तो 21 जुलाई को ही बन गई थी और पांच अगस्त तक केस दो बार लिस्ट हो चुका है, ऐसे में जानकारी न होने की बात पर विश्वास करना कठिन है। यह केवल स्थगन लेने का बहाना लगता है। हालांकि, कोर्ट ने वकील पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की।
कहा, 80 प्रतिशत आपराधिक अपीलों में यही स्थिति है। कई मामलों में पेपर बुक तीन-चार साल पहले बन चुकी होती है, फिर भी वकील कहते हैं कि उन्हें मिली ही नहीं। हाई कोर्ट के नियमों में कहीं नहीं लिखा गया है कि सेक्शन को नोटिस प्रकाशित कर बताना होगा कि पेपर बुक बन गई है।
सेक्शन अधिकारी और रजिस्ट्रार ने बताया कि फोन से सूचना दी जाती है, लेकिन उसका कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता। इसलिए सुनवाई टलती है और न्यायिक समय बर्बाद होता है। इससे संस्था की गरिमा को नुकसान पहुंचता है। कोर्ट, कानून की अदालत की जगह नौकरशाही सूचना केंद्र बनकर रह गई है।
क्या होता है पेपर बुक?
बता दें कि पेपर बुक में ट्रायल कोर्ट का सारा रिकॉर्ड पुस्तक स्वरूप में होता है। खंडपीठ ने सक्षम कमेटी से अनुरोध किया कि या तो कोर्ट नियमों में संशोधन किया जाए अथवा प्रशासनिक आदेश जारी कर सेक्शन को हर सप्ताह वेबसाइट पर यह नोटिफिकेशन प्रकाशित करना अनिवार्य किया जाए कि किन अपीलों में पेपर बुक तैयार हुई है।
ऐसी अपीलें वकील को पेपर बुक लेने का समय देने के बाद ही लिस्ट हों, ताकि केस मेरिट पर सुना जा सके और कोर्ट का समय बचे। अपीलार्थियों को गुन्नौर थाने में दर्ज केस में सत्र न्यायालय ने अगस्त 2023 में सजा सुनाई है। इसे चुनौती दी गई है।
