इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज की 'द क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ यूपी' की याचिका, CBI जांच कराने से भी इनकार
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 'द क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तर प्रदेश' की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें भंग ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज की द क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ यूपी।
HighLights
हाई कोर्ट ने यूपी क्रिकेट एसोसिएशन की याचिका खारिज की।
भंग हुई सोसाइटी की संपत्ति हस्तांतरण की मांग अस्वीकृत।
सीबीआई जांच और प्रतिबंध की मांग निराधार बताई।
विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ‘द क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तर प्रदेश’ की उस याचिका को बिना किसी हर्जाने के साथ खारिज कर दिया है, जिसमें उसने भंग हो चुकी ‘द उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन’ (सोसाइटी) की संपत्ति, खाते और संसाधन हस्तांतरित करने की मांग की थी। यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने दिया है।
मुकदमे से जुड़े तथ्य यह हैं कि 1955 में बनी 'द यूपीसीए' सोसाइटी ने तीन सितंबर 2005 को अपने 3/5वें बहुमत सदस्यों के प्रस्ताव से खुद को भंग कर दिया और अपनी सारी संपत्ति, देनदारियां व कार्य कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के तहत नवगठित "यूपीसीए" (कंपनी) को सौंप दिया था।
याची एसोसिएशन का दावा था कि यह विघटन कानूनी तौर पर वैध नहीं था और चूंकि सरकार सोसाइटी में ‘योगदानकर्ता’ थी, इसलिए राज्य सरकार की सहमति के बिना विघटन नहीं हो सकता था। याची ने बीसीसीआई से भी देनदारियां हस्तांतरित करने, यूपीसीए पर प्रतिबंध लगाने, सीबीआई जांच और उच्चस्तरीय समिति गठित करने की मांग की थी।
कोर्ट ने पाया कि सोसाइटी का विघटन धारा 13 के प्रावधानों के अनुरूप हुआ था और इसे 21 साल बाद चुनौती नहीं दी जा सकती। राज्य सरकार यह साबित नहीं कर पाई कि वह सोसाइटी में "योगदानकर्ता" या हितधारक थी, इसलिए दूसरे प्रावधान की बाध्यता लागू नहीं होती।
धारा 14/14ए केवल तभी लागू होती जब संपत्ति किसी को हस्तांतरित न की गई हो। यहां संपत्ति समान उद्देश्यों वाली गैर-लाभकारी कंपनी को हस्तांतरित की जा चुकी थी, जो सोसाइटी के बायलॉज (क्लाज 2(आर)) के अनुरूप थी।
यूपीसीए बीसीसीआई की पूर्ण सदस्य है और लोढ़ा समिति की सिफारिशों के अनुरूप अपना संविधान संशोधित कर चुकी है। सीबीआई जांच और प्रतिबंध की मांग को कोर्ट ने 'निराधार' और निजी संपत्ति विवाद बताया।
कहा, इसके लिए उचित मंच, जैसे नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) उपलब्ध है। याची चाहें तो अपनी शिकायतें राज्य सरकार या बीसीसीआई के समक्ष रख सकता है, लेकिन विघटन या संबद्धता के मुद्दे पर हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
