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बहू को सास का शस्त्र लाइसेंस ट्रांसफर करने से इन्कार पर हस्तक्षेप नहीं, इलाहाबाद HC में पीलीभीत की शिक्षिका की याचिका खारिज

By Suresh pandey Edited By: Brijesh Srivastava
Published: Tue, 29 Sep 2026 01:36 PM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पीलीभीत की एक शिक्षिका की अपनी सास का शस्त्र लाइसेंस अपने नाम ट्रांसफर कराने की याचिका ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट।

इलाहाबाद हाई कोर्ट।

HighLights

  1. कानून की शर्तों पर ही मिल सकता है लाइसेंस : हाई कोर्ट

  2. कहा- शस्त्र लाइसेंस एक विशेषाधिकार है,अधिकार नहीं

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पीलीभीत की एक शिक्षिका की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपनी सास के नाम जारी शस्त्र लाइसेंस को अपने नाम ट्रांसफर कराने की मांग की थी। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने कहा कि शस्त्र लाइसेंस एक विशेषाधिकार है, अधिकार नहीं, और इसे केवल उचित कारण होने पर विशेष स्थिति में ही दिया जा सकता है।

शस्त्र लाइसेंस ट्रांसफर करने की मांग की थी

अलका तोमर ने आर्म्स रूल्स, 2016 के नियम 25 के तहत आवेदन देकर अपनी सास के नाम जारी शस्त्र लाइसेंस को विरासत के आधार पर अपने नाम ट्रांसफर करने की मांग की थी। उनका कहना था कि वे लाइसेंसधारी की बहू हैं और अपनी जान-माल की सुरक्षा के लिए शस्त्र चाहती हैं। सास की उम्र 70 वर्ष से अधिक है और उन्होंने ट्रांसफर पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी।

डीएम पीलीभीत ने आवेदन निरस्त किया

उप जिलाधिकारी (एसडीएम), अमरिया, पीलीभीत ने लाइसेंस ट्रांसफर की संस्तुति की थी। हालांकि पुलिस रिपोर्ट रिकॉर्ड पर नहीं थी। आवेदन पर समय से निर्णय नहीं होने पर याचिकाकर्ता इससे पहले हाई कोर्ट पहुंची थीं। उस याचिका का निस्तारण इस निर्देश के साथ हुआ कि उनके आवेदन को गुण-दोष के आधार पर तय किया जाए। इसके बाद जिलाधिकारी पीलीभीत ने 25 जनवरी 2024 को आवेदन निरस्त कर दिया। इस आदेश के खिलाफ अपील भी उन्हीं आधारों पर खारिज हो गई, जिसके बाद उन्होंने वर्तमान याचिका दाखिल की।

पुलिस की रिपोर्ट क्या कहती है?

जिलाधिकारी के आदेश के अनुसार, याचिकाकर्ता के पति के पास पहले से ही एक शस्त्र लाइसेंस है जो सुरक्षा की दृष्टि से पर्याप्त है। पुलिस अधीक्षक और उप जिलाधिकारी की आख्या में यह भी सामने आया कि आवेदिका या उनके परिवार को किसी प्रकार के जीवन-भय का तथ्य नहीं मिला। वे शिक्षिका हैं और रोज ड्यूटी पर जाकर घर लौटती हैं। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार उनकी किसी से दुश्मनी नहीं है और न ही कोई मुकदमा चल रहा है। 

याचिकाकर्ता व सरकार की ओर से दी गई दलील

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संतोष कुमार शुक्ला ने दलील दी कि जब एसडीएम की सकारात्मक संस्तुति थी और कोई प्रतिकूल सामग्री नहीं थी, तो आवेदन खारिज करने का कोई कारण नहीं था। उन्होंने कहा कि केवल यह कहकर आवेदन अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि खतरा नहीं है। राज्य सरकार की ओर से अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता एचसी दुबे ने दोनों आदेशों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि ट्रांसफर का कोई उचित कारण नहीं मिला और याचिकाकर्ता के पति के पास पहले से लाइसेंसी हथियार है।

कोर्ट का स्पष्ट निर्देश

कोर्ट ने कहा कि नियम 25 के तहत लाइसेंसिंग प्राधिकारी विधिक वारिस को लाइसेंस दे सकता है, बशर्ते अधिनियम और नियमों की पात्रता शर्तें पूरी हों और पुलिस रिपोर्ट में कोई प्रतिकूल टिप्पणी न हो। अतः आर्म्स एक्ट की धारा 13 की शर्तें पूरी होना जरूरी है, जिसकी उपधारा 3(बी) के अनुसार लाइसेंसिंग प्राधिकारी को संतुष्ट होना चाहिए कि आवेदक के पास हथियार पाने का उचित कारण है। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने न तो याचिका में और न ही किसी अन्य दस्तावेज के जरिए यह दिखाया कि उनकी जान या संपत्ति को कोई खतरा है।

कोर्ट ने आदेशों में हस्तक्षेप से इनकार किया

एसपी की रिपोर्ट में खतरा न होने की बात को भी चुनौती नहीं दी गई। कोर्ट ने टिप्पणी की कि शिक्षिका होने के नाते वे स्कूल में लाइसेंसी हथियार लेकर नहीं जा सकतीं। साथ ही सामान्य परिस्थितियों में एक शिक्षक को लाइसेंसी हथियार की आवश्यकता नहीं होती और यहां कोई असाधारण परिस्थिति भी नहीं है। इन आधारों पर कोर्ट ने जिलाधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी के आदेशों में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिका को गुण-रहित बताकर खारिज कर दिया।

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