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'फर्जी अनुमोदन के आधार पर वेतन का दावा नहीं कर सकते शिक्षक', इलाहाबाद हाई कोर्ट की टिप्पणी

Published: Tue, 29 Sep 2026 06:43 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि फर्जी अनुमोदन आदेश के आधार पर सरकारी खजाने से वेतन का दावा ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

HighLights

  1. फर्जी अनुमोदन आदेश पर वेतन का दावा अवैध।

  2. वैध नियुक्ति और स्वीकृत पद वेतन हेतु अनिवार्य।

  3. संत कबीर नगर शिक्षक की याचिका खारिज हुई।

जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि फर्जी अनुमोदन आदेश के आधार पर सरकारी खजाने से वेतन और अन्य सेवा लाभ पाने का दावा नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान की एकलपीठ ने कहा कि किसी कर्मचारी की नियुक्ति का आधार ही फर्जी दस्तावेज हो तो उसे केवल लंबे समय तक काम करने या पहले जारी प्रशासनिक आदेश के आधार पर वेतन पाने का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता।

सरकारी खजाने से वेतन पाने के लिए वैध नियुक्ति और स्वीकृत पद जरूरी है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने संतकबीर नगर स्थित महात्मा गांधी कृषक पूर्व माध्यमिक विद्यालय, किनोना, कुरथिया में सहायक अध्यापक शीतला प्रसाद की याचिका खारिज कर दी है।

याची ने वर्ष 1977 में नियुक्ति होने का दावा करते हुए वेतन व बकाया भुगतान की मांग की थी। उसका कहना था कि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 29 जुलाई 1982 को उसकी नियुक्ति को मंजूरी दी थी। इसके बाद नौ मार्च 2000 को भी अधिकारियों ने एक मार्च 1991 से वेतन भुगतान का आदेश दिया था, लेकिन उसे वेतन नहीं मिला।

याची की ओर से दलील दी गई कि नियुक्ति के अनुमोदन संबंधी आदेश के आधार पर उसके साथ चयनित अन्य शिक्षक वेतन प्राप्त कर रहे हैं, जबकि उसे इससे वंचित रखा गया। उसका नाम प्रबंधक की रिटर्न सूची में शामिल नहीं होने के कारण वेतन भुगतान बाधित हुआ था। राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याची की नियुक्ति किसी स्वीकृत पद पर नहीं हुई थी।

नियुक्ति के अनुमोदन से संबंधित मूल अभिलेख उपलब्ध नहीं थे और वर्ष 1982 के अनुमोदन आदेश की प्रमाणिकता भी संदिग्ध थी। विभागीय रिकार्ड के अनुसार याची का नाम अनुदान सूची में शामिल होने के समय तैयार प्रबंधकीय विवरण और वर्ष 2011 की निरीक्षण रिपोर्ट में भी दर्ज नहीं था। विद्यालय प्रबंधक ने भी बताया था कि याची ने वर्ष 2005 तक ही काम किया था।

हाई कोर्ट ने पाया कि सक्षम प्राधिकारी ने पूर्व में पारित न्यायालय के आदेश के अनुपालन में याची को सुनवाई का अवसर दिया और उपलब्ध अभिलेखों की जांच के बाद उसका दावा खारिज किया था। अदालत ने कहा, याची अनुमोदन आदेश की प्रामाणिकता साबित करने के लिए कोई विश्वसनीय समकालीन दस्तावेज पेश नहीं कर सका।

मूल विभागीय रिकार्ड की जांच में 29 जुलाई 1982 का कथित अनुमोदन आदेश फर्जी पाया गया। अदालत ने कहा कि याची वर्ष 2005 के बाद लगातार काम करने का प्रमाण भी प्रस्तुत नहीं कर सका। ऐसे में वेतन भुगतान का दावा कानूनी रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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