हर वैवाहिक विवाद गर्भपात का आधार नहीं बन सकता, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की याचिकाएं
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि हर वैवाहिक विवाद गर्भपात का आधार नहीं बन सकता, यह ...और पढ़ें

HighLights
वैवाहिक विवाद गर्भपात का आधार नहीं बन सकता: इलाहाबाद हाई कोर्ट।
कोर्ट ने अजन्मे जीवन की पवित्रता पर जोर दिया, याचिका खारिज।
पति को पत्नी को प्रतिमाह 12 हजार रुपये देने का निर्देश।
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गर्भसमापन की अनुमति से जुड़ी याचिका पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि हर वैवाहिक विवाद को गर्भपात का आधार मानना कानून को फिर से लिखने जैसा होगा। पति-पत्नी के बीच मनमुटाव या अस्थायी अलगाव को वैवाहिक स्थिति में बदलाव नहीं माना जा सकता। वैवाहिक स्थिति में बदलाव से आशय स्थायी परिवर्तन, जैसे विधवा होना या कानूनी तलाक से है।
कोर्ट ने अजन्मे जीवन की पवित्रता पर मदर टेरेसा के 1979 के नोबेल शांति पुरस्कार भाषण के उस कथन को भी उद्धृत किया कि आज शांति का सबसे बड़ा विनाशक गर्भपात है, क्योंकि यह बच्चे के खिलाफ युद्ध है, मासूम की सीधी हत्या है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने भदोही निवासी विवाहिता की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
याची ने गाजीपुर में तैनात कांस्टेबल पति पर प्रताड़ित करने और मारपीट का आरोप लगाते हुए गर्भसमापन की अनुमति मांगी थी। उसका कहना था कि पति चरित्र पर शक करता है और वह आर्थिक रूप से बच्चे के पालन-पोषण में सक्षम नहीं है। मेडिकल जांच में 17 सप्ताह दो दिन का जीवित भ्रूण पाया गया और उसमें कोई विकृति नहीं थी।
सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971 के नियम 3बी का हवाला दिया, जिसमें 20 से 24 हफ्ते तक सात श्रेणियों दुष्कर्म पीड़िता, नाबालिग, वैवाहिक स्थिति में बदलाव (विधवा और तलाक), दिव्यांग, मानसिक रोगी, भ्रूण में गंभीर विकृति और आपदा स्थिति में ही गर्भपात की पात्रता है।
कोर्ट ने कहा कि प्रजनन स्वायत्तता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अधिकार है, लेकिन गर्भसमापन कानून की निर्धारित शर्तों के भीतर ही हो सकता है। मामले में मां की जान को खतरा, गंभीर मानसिक आघात या भ्रूण में विकृति जैसी स्थिति सामने नहीं आई।
क्रूरता का कोई ठोस साक्ष्य और प्राथमिकी भी नहीं थी। खंडपीठ ने महिला की आर्थिक परेशानी के तर्क को भी स्वीकार नहीं किया। पति की ओर से प्रतिमाह 12 हजार रुपये देने की सहमति के आधार पर कोर्ट ने गाजीपुर के पुलिस अधीक्षक को यह राशि उसके वेतन से कटवाकर महिला के खाते में भेजने की व्यवस्था कराने का निर्देश दिया। साथ ही सीएमओ भदोही को महिला की निश्शुल्क काउंसलिंग और उपचार कराने को कहा।
