सरकारी डॉक्टर के खिलाफ FIR दर्ज करने संबंधी मजिस्ट्रेट का आदेश इलाहाबाद HC ने रद किया
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकारी डॉक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया है। ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट की फाइल फोटो।
HighLights
हाई कोर्ट ने कहा- जांच समिति के सदस्य के रूप में की गई कार्रवाई आपराधिक साजिश नहीं
प्रकरण नोएडा के यथार्थ अस्पताल से संबंधित, हाई कोर्ट ने डॉ. राहुल वर्मा की याचिका पर निर्णय
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकारी डॉक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने संबंधी मजिस्ट्रेट का आदेश रद कर दिया है। न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने डॉ. राहुल वर्मा की याचिका पर यह निर्णय सुनाया। कोर्ट ने कहा कि जांच समिति के सदस्य के रूप में की गई कार्रवाई को आपराधिक साजिश नहीं माना जा सकता और सरकारी अधिकारी के खिलाफ आदेश से पहले उसे सुनना आवश्यक है।
प्रकरण नोएडा के यथार्थ अस्पताल से संबंधित है। शिकायतकर्ता धीरेंद्र ने आरोप लगाया था कि 31 मई 2025 को उनकी पत्नी की पित्ताशय की लैप्रोस्कोपिक सर्जरी डा. हामिदी की निगरानी में हुई, लेकिन निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और 10 मिलीमीटर का पत्थर पेट में रह गया। बाद में मैक्स अस्पताल में डॉ. आशीष ने वह पत्थर निकाला।
शिकायत पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी, गौतमबुद्धनगर ने डा. शुभ्रा मित्तल की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई, जिसमें डॉ. राहुल वर्मा भी शामिल थे। रिपोर्ट से असंतुष्ट होकर शिकायतकर्ता ने बीएनएसएस की धारा 173(4) के तहत कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम) ने 12 अगस्त 2026 को एफआइआर दर्ज कराने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने कहा कि डॉ. वर्मा सर्जरी करने वाली टीम में नहीं थे, वे केवल जांच समिति के सदस्य थे। उनके खिलाफ लापरवाही का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। समिति की रिपोर्ट से असहमति होना साजिश का सबूत नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि बीएनएसएस की धारा 175(4)(बी) के तहत लोकसेवक के खिलाफ जांच का आदेश देने से पहले उसका पक्ष सुनना अनिवार्य है, जो इस मामले में नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट के ओम प्रकाश अंबादकर बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने 12 अगस्त 2026 का आदेश और डा. वर्मा से जुड़ी पूरी कार्यवाही रद कर दी।
