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चार्जशीट के बाद निजी मुचलके पर रिहाई आरोपित का अधिकार नहीं, ट्रायल कोर्ट के विवेक पर निर्भर: इलाहाबाद हाई कोर्ट

By Jagran NewsEdited By: Shiv Govind Mishraa
Published: Sun, 01 Nov 2026 03:34 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद निजी मुचलके पर रिहाई आरोपित का अधिकार नहीं, बल्कि ट्रायल कोर्ट के विवेक पर निर्भर है।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

HighLights

  1. चार्जशीट के बाद निजी मुचलके पर रिहाई अधिकार नहीं।

  2. ट्रायल कोर्ट के विवेक पर निर्भर करेगा रिहाई का फैसला।

  3. बच्ची देवी फैसले के निर्देशों पर वृहद पीठ को भेजा मामला।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किए गए आरोपित को चार्जशीट दाखिल होने के बाद निजी मुचलके पर रिहा करना उसका अधिकार नहीं है। इस पर फैसला करना ट्रायल कोर्ट के विवेकाधिकार पर निर्भर है।

न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने इस मामले में समकक्ष पीठ के बच्ची देवी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले में दिए गए तीन निर्देशों से असहमति जताते हुए प्रकरण वृहद पीठ को संदर्भित कर दिया है। मामला जमानत निरस्त करने की मांग से जुड़ा है। याची अरुण कुमार ने औरैया थाने में बीएनएस और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराओं में एफआइआर दर्ज कराई थी।

इसमें मृतका के जेठ, सास और ससुर आरोपित हैं। पति पहले ही समर्पण कर जमानत पर है। आरोपितों ने एफआइआर को चुनौती दी थी, जिस पर पुलिस रिपोर्ट आने तक उनकी गिरफ्तारी पर रोक थी। तीन दिसंबर 2025 को चार्जशीट दाखिल हुई और 22 दिसंबर को कोर्ट ने संज्ञान लेकर समन जारी किया। पेश न होने पर ट्रायल कोर्ट ने कई बार जमानती वारंट जारी किए।

दो मई 2026 को पेश होने पर सीजेएम ने निर्देशों के आधार पर आरोपितों को बिना जमानतदार एक-एक लाख रुपये के निजी मुचलके पर रिहा कर दिया। हाई कोर्ट में याची के अधिवक्ताओं ने इसे सतेंद्र कुमार अंतिल और मुशीर आलम के फैसलों में दिए गए निर्देशों के विपरीत बताया। वहीं, एजीए और न्याय मित्रों ने दलील दी कि बीएनएसएस की धारा 91 में प्रयुक्त 'मे' शब्द अदालत के विवेकाधिकार को दर्शाता है, न कि आरोपित के अधिकार को।

धारा 485 में भी जमानतदारों की संख्या तय करने का अधिकार मजिस्ट्रेट को दिया गया है। हाई कोर्ट ने कहा कि बच्ची देवी फैसले का निर्देश 38(आइ) सभी अपराधों में बिना जमानत अर्जी रिहाई अनिवार्य करता है, जबकि सतेंद्र अंतिल फैसले में अपराधों की चार श्रेणियां बनाई गई हैं।

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सात वर्ष से अधिक सजा वाले गंभीर अपराधों में जमानत गुण-दोष के आधार पर तय होनी चाहिए। पीठ ने निर्देश 38(4) और 46 पर भी सवाल उठाए। इनकी वैधानिकता और अन्य फैसलों से टकराव की स्थिति स्पष्ट करने के लिए तीनों निर्देश वृहद पीठ को भेज दिए।

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