भरण-पोषण निष्पादन वाद 6 माह में नहीं निपटाना अवमानना, इलाहाबाद HC का UP के सभी फैमिली कोर्ट को महत्वपूर्ण निर्देश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी के सभी फैमिली कोर्ट को भरण-पोषण निष्पादन वाद छह माह में निपटाने का निर्देश दिया ...और पढ़ें

इलाहाबाद उच्च न्यायालय।
HighLights
कोर्ट ने कहा कि सभी ट्रायल कोर्ट सुप्रीम कोर्ट और महानिबंधक के निर्देशों का कड़ाई से पालन करें
परिवार न्यायालय कासगंज के आदेश को चुनौती देने वाली पुनरीक्षण याचिका हाई कोर्ट में खारिज
विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रदेश के सभी परिवार न्यायालयों (फैमिली कोर्ट) को निर्देश दिया है कि वह भरण-पोषण के निष्पादन वादों का निपटारा छह महीने के भीतर हर हाल में करें। कोर्ट के अनुसार ऐसा नहीं करना सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय की अवमानना माना जाएगा। न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की एकलपीठ ने कासगंज निवासी दाता राम की पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए यह अहम निर्देश दिया है।
शीर्ष अदालत ने विलंब पर चिंता जताई थी
कोर्ट ने कहा, सुप्रीम कोर्ट ने पेरियाम्मल बनाम वी. राजामणि (2025) और राहुल एस. शाह बनाम जिनेंद्र कुमार गांधी (2021) मामले में स्पष्ट किया है कि निष्पादन याचिकाएं दाखिल होने से छह माह में निपटाई जाएं। शीर्ष अदालत ने विलंब पर चिंता जताई थी। इसके अनुपालन में हाई कोर्ट के महानिबंधक ने 24 मई 2025 को परिपत्र जारी किया। इसके तहत सभी जिला जज, प्रधान न्यायाधीश परिवार न्यायालय, कमर्शियल कोर्ट, मोटर दावा दुर्घटना अधिकरण (एमएसीटी), भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरण (एलएआरआरए) के पीठासीन अधिकारियों को चेताया था कि छह माह में निष्पादन न होने पर संबंधित अधिकारी हाई कोर्ट के प्रशासनिक पक्ष के प्रति जवाबदेह होंगे।
कड़ाई से निर्देशों का पालन करें
कोर्ट ने कहा कि सभी ट्रायल कोर्ट सुप्रीम कोर्ट और महानिबंधक के उक्त निर्देशों का कड़ाई से पालन करें। प्रकरण से जुड़े संक्षिप्त तथ्य यह है कि कासगंज परिवार न्यायालय ने 17 सितंबर 2024 को दाता राम को आदेश दिया था कि वह पत्नी पूनम को तीन हजार रुपये और दो नाबालिग बच्चों को एक-एक हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण दे। यह भुगतान 18 अप्रैल 2022 से देय था। दाता राम ने 645 दिन बाद इसे चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।
आदेश की प्रति कासगंज परिवार न्यायालय भेजा जाए
याची के वकील का तर्क था कि तय राशि उसकी आय के अनुपात में अधिक है। कोर्ट ने पूछा कि क्या भरण-पोषण आदेश का निष्पादन हुआ है तो वकील जवाब नहीं दे सके। इस पर कोर्ट ने कहा कि क्षमा याचिका के शपथपत्र में इतनी लंबी देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं है। इसलिए विलंब क्षमा याचिका खारिज की जाती है और पुनरीक्षण कालबाधित होने के कारण खारिज किया जाता है। कोर्ट ने आदेश की प्रति अनुपालन के लिए कासगंज परिवार न्यायालय भेजने के लिए भी कहा है।
