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'आजादी का मतलब यह नहीं कि कब्रिस्तान के लिए सरकारी जमीन का टुकड़ा मांगें'; इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला

By Jagran NewsEdited By: Sachin Sharma
Published: Wed, 14 Oct 2026 07:40 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि धर्म की स्वतंत्रता किसी समुदाय को स्थानीय निकाय की जमीन पर कब्रिस्तान बनाने का दावा करने का हक नहीं देती।

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HighLights

  1. धार्मिक स्वतंत्रता से सरकारी जमीन पर दावा नहीं।

  2. गाजियाबाद कब्रिस्तान याचिका हाई कोर्ट ने खारिज की।

  3. जमीन आवंटन प्रशासनिक निर्णय, समुदाय का अधिकार नहीं।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि धर्म की स्वतंत्रता और धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करने का अधिकार किसी समुदाय को स्थानीय निकाय की जमीन के किसी खास हिस्से पर कब्रिस्तान बनाने का दावा करने का हक नहीं देता।

न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने क्रिश्चियन कम्युनिटी वेलफेयर सोसाइटी की याचिका खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। सोसाइटी ने गाजियाबाद में बंजर जमीन के एक हिस्से को ईसाई कब्रिस्तान में बदलने की मांग खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी।

सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत पंजीकृत संस्था ने अपने अध्यक्ष विनय कुमार पाल के माध्यम से याचिका दायर की थी। प्रकरण मोदी नगर तहसील के जलालबाद परगना स्थित विसोखर गांव की 0.3420 हेक्टेयर जमीन से जुड़ा है। सरकारी रिकॉर्ड में यह जमीन बंजर दर्ज है। याची का कहना था कि आसपास रहने वाले ईसाइयों को अंतिम संस्कार में कठिनाई हो रही है, क्योंकि बेगमाबाद बुढ़ाना के ईसाई कब्रिस्तान में जगह कम पड़ रही है।

सोसाइटी ने यह भी बताया कि मोदी नगर नगर पालिका परिषद के बोर्ड ने 22 जनवरी 2018 को ईसाई कब्रिस्तान के लिए जमीन आवंटित करने का प्रस्ताव पारित किया था। हाई कोर्ट ने कहा कि गांव सभा या स्थानीय निकाय को सौंपी गई जमीन को सार्वजनिक उपयोग के लिए बदला जा सकता है, लेकिन यह प्रशासनिक निर्णय है।

इसके लिए अधिकारियों को विभिन्न परिस्थितियों और कारकों के साथ स्थानीय नागरिकों के व्यापक और विविध जनहित पर विचार करना होता है। यदि वास्तव में जगह की कमी हो तो अधिकारी ऐसे अनुरोध पर विचार कर सकते हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति या समुदाय को स्थानीय निकाय की जमीन के किसी खास हिस्से को कब्रिस्तान के लिए आरक्षित कराने का कानूनी अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने कहा- ‘यह सच है कि याची यह कह सकता है कि अपने धर्म के नियमों के अनुसार अंतिम संस्कार करने का अधिकार उनके धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है, लेकिन इस अधिकार का दावा इस तरह से नहीं किया जा सकता कि याची या ईसाई समुदाय के सदस्य स्थानीय निकाय के पास मौजूद जमीन के किसी खास हिस्से को ईसाई कब्रिस्तान बनाने के मकसद से आरक्षित करने की मांग कर सकें।

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