वरिष्ठ नागरिकों के लिए गठित अधिकरण सिविल कोर्ट का विकल्प नहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की; बताई इनकी हद
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए गठित अधिकरण सिविल कोर्ट का विकल्प नहीं है। ...और पढ़ें

इलाहाबाद उच्च न्यायालय।
HighLights
हाई कोर्ट ने कहा- संपत्ति स्वामित्व से जुड़े विवादों पर अभिकरण फैसला नहीं ले सकता
कोर्ट ने सभी अधिकरणों को कानूनी प्रक्रिया के तहत ही कार्यवाही करने के लिए आगाह किया
विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि माता-पिता व वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम के तहत गठित अधिकरण सिविल कोर्ट का विकल्प नहीं है। वह संपत्ति स्वामित्व से जुड़े विवादों पर फैसला नहीं ले सकता।
अधिनियम की धारा-23 (1) तभी लागू होगी जब वरिष्ठ नागरिक के किसी शर्त के साथ वैध रूप से संपत्ति हस्तांतरित की हो और लाभार्थी उसे पूरा न करे। जहां दस्तावेज फर्जी होने का आरोप हो वहां अधिकरण दस्तावेज को अमान्य घोषित नहीं कर सकता। यह अधिकार केवल सक्षम सिविल अदालत को ही है।
कोर्ट ने कहा अधिकरण की बेदखली की शक्ति केवल वरिष्ठ नागरिक के जीवन सुरक्षा और भरण-पोषण के संरक्षण के लिए आनुषंगिक राहत के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं। न्यायालय ने इस बात के लिए नाराजगी जताई कि अधिकरण द्वारा फर्जीवाड़े की जांच के लिए समिति गठित की गई, जो अर्द्ध न्यायिक कार्यवाही की उचित प्रक्रिया नहीं है।
इसके साथ कोर्ट ने सभी अधिकरणों को कानूनी प्रक्रिया के तहत ही कार्यवाही करने के लिए आगाह किया। कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिक की याचिका खारिज कर दी और कहा कि दान विलेख को फर्जी घोषित कराने के लिए सिविल अदालत में मुकदमा दायर कर सकते हैं।
यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर तथा न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने 68 वर्षीय बलवीर सिंह की याचिका पर दिया है। इसमें ललितपुर के जिलाधिकारी के 23 जून 2026 के आदेश को चुनौती दी थी। याची का कहना था कि बेटी और दामाद ने उसके मकान का फर्जी दान दस्तावेज पंजीकृत करा लिया है। उस पर उसके हस्ताक्षर नहीं है।
इसी दस्तावेज के सहारे उसे मारपीट कर घर से बेदखल कर दिया है। घटना की एफआईआर भी दर्ज कराई गई है। पुलिस ने चार्जशीट दाखिल कर दी है। याची ने जिलाधिकारी अधिकरण के समक्ष आवेदन दिया था, जिसे खारिज कर दिया गया। इसी को याचिका में चुनौती दी गई थी।
