पत्नी व बच्चों का भरण-पोषण पति का पवित्र दायित्व, मनुस्मृति का हवाला देकर इलाहाबाद HC का महत्वपूर्ण आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण को पति का पवित्र दायित्व बताया है। कोर्ट ने कानपुर फैमिली कोर्ट ...और पढ़ें

इलाहाबाद उच्च न्यायालय।
HighLights
बैंककर्मी पति के वेतन का 25% काटकर पत्नी के खाते में जमा करने का निर्देश
हाई कोर्ट ने कानपुर फैमिली कोर्ट का आदेश संशोधित करके निर्देशित किया
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भरण-पोषण के एक मामले में कहा है कि पत्नी, नाबालिग बच्चों और वृद्ध माता-पिता का भरण-पोषण करना पति का कानूनी ही नहीं, पवित्र दायित्व भी है। न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने यह टिप्पणी कानपुर नगर की पिंकी वर्मा की पुनरीक्षण याचिका निस्तारित करते हुए की।
हर माह पति के वेतन का 25% पत्नी को देने का आदेश
कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय का आदेश संशोधित करके निर्देश दिया कि पति के सकल वेतन में से केवल इनकम टैक्स की कटौती के बाद बची राशि का 25 प्रतिशत हर माह काटकर पत्नी के सत्यापित बैंक खाते में जमा किया जाए। इसके लिए प्रधान न्यायाधीश, पारिवारिक न्यायालय इंडियन बैंक, उन्नाव के उच्च अधिकारी को आदेश जारी करेंगे।
पारिवारिक न्यायालय के आदेश को चुनौती दी थी
कानपुर नगर की पिंकी वर्मा ने पारिवारिक न्यायालय के 22 दिसंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी थी। आदेश में पति सौरभ उर्फ बृज को पत्नी और नाबालिग बेटी के लिए 19 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने को कहा गया था। पत्नी ने राशि कम बताते हुए 40 हजार रुपये प्रतिमाह की मांग की थी।
पति इंडियन बैंक, उन्नाव में विंडो आपरेटर है
याची के अधिवक्ता ने बताया कि पति इंडियन बैंक, उन्नाव में विंडो आपरेटर हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के डॉ. कुलभूषण कुमार बनाम राजकुमारी और कल्याण डे चौधरी बनाम रीता डे चौधरी मामलों का हवाला देते हुए कहा कि वेतन का 25 प्रतिशत भरण-पोषण के लिए उचित है। दीपा जोशी बनाम गौरव जोशी 2026 के फैसले के आधार पर उन्होंने यह भी तर्क दिया कि लोन की किस्त जैसी स्वैच्छिक कटौतियां आय से नहीं घटाई जा सकतीं, क्योंकि वे संपत्ति बनाने के लिए किया गया निवेश हैं और भरण-पोषण की वैधानिक जिम्मेदारी से ऊपर नहीं हो सकतीं।
कोर्ट ने मनुस्मृति का उल्लेख किया
पति पक्ष के अधिवक्ता ने भी वेतन के 25 प्रतिशत भरण-पोषण पर सहमति जताई। कोर्ट ने मनुस्मृति के अध्याय 11 के श्लोक 10 'वृद्धौ च मातापितरौ साध्वी भार्या सुतः शिशुः। अपकार्यशतं कृत्वा भर्तव्या मनुर्ब्रवीत्' का उल्लेख किया, जिसका आशय है कि वृद्ध माता-पिता, पतिव्रता पत्नी और छोटे शिशु का भरण-पोषण सौ बुरे काम करके भी करना चाहिए।
बेसहारा पत्नी को भुखमरी से बचाना है ...
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अंजू गर्ग बनाम दीपक कुमार गर्ग 2022 के फैसले का भी हवाला दिया। उसमें कहा गया था कि पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण पति का पवित्र कर्तव्य है और हट्टा-कट्टा पति को मजदूरी करके भी यह दायित्व निभाना चाहिए। धारा 125 सीआरपीसी का उद्देश्य किसी को सजा देना नहीं, बल्कि बेसहारा पत्नी को भुखमरी से बचाना है।
