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कानपुर प्रॉपर्टी विवाद: हाई कोर्ट ने खारिज की संजय त्रिपाठी की दूसरी जमानत अर्जी, ट्रायल जल्द पूरा करने का निर्देश

By Jagran NewsEdited By: Shiv Govind Mishraa
Published: Thu, 29 Oct 2026 05:37 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कानपुर प्रॉपर्टी विवाद में आरोपित संजय त्रिपाठी की दूसरी जमानत अर्जी खारिज कर दी है। कोर्ट ...और पढ़ें

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HighLights

  1. कानपुर प्रॉपर्टी विवाद में संजय त्रिपाठी की जमानत अर्जी खारिज।

  2. प्रभावी बचाव का अधिकार जमानत का एकमात्र आधार नहीं।

  3. हाई कोर्ट ने निचली अदालत को शीघ्र ट्रायल का निर्देश दिया।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि प्रभावी बचाव तैयार करने का अधिकार जमानत पर विचार के लिए प्रासंगिक है, लेकिन यह अकेले जमानत देने का आधार नहीं हो सकता। यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति अनिल कुमार (दशम) की एकलपीठ ने कानपुर नगर के प्रापर्टी विवाद से जुड़े मामले में आरोपित संजय त्रिपाठी की दूसरी जमानत अर्जी खारिज कर दी है। कोर्ट ने अधीनस्थ अदालत को बिना अनावश्यक स्थगन ट्रायल शीघ्र पूरा करने का निर्देश भी दिया है।

आवेदक आरोपित के खिलाफ हनुमंत विहार थाने में बीएनएस की धाराओं और एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज है। दस्तावेजों में हेराफेरी और जमीन पर अवैध कब्जे का आरोप है। हाई कोर्ट ने उनकी पहली जमानत अर्जी 12 नवंबर 2025 को खारिज की थी। आरोपित के वकील ने कहा कि उनका मुवक्किल लगभग एक साल से जेल में है और ट्रायल अंतिम चरण में है। सभी गवाहों की गवाही हो चुकी है।

जमानत दिए जाने की कही थी बात

साक्ष्य जुटाने के लिए जमानत जरूरी है और यह निष्पक्ष सुनवाई का हिस्सा है। मामले को सिविल प्रापर्टी विवाद बताते हुए आशा बनाम यूपी सरकार 2025 के फैसले का हवाला दिया। इस फैसले में अभियोजन साक्ष्य समाप्त होने के बाद बचाव की तैयारी के लिए जमानत दिए जाने की बात कही गई थी।

राज्य सरकार और शिकायतकर्ता पक्ष ने दलील दी कि जांच अधिकारी की जिरह अभी जारी है और ट्रायल पूरा नहीं हुआ है। उनके अनुसार, आरोपित ने हर गवाह से पांच-छह दिन तक जिरह कर सुनवाई में देरी की है। पहली अर्जी खारिज होने के बाद कोई नया आधार भी नहीं है। हाई कोर्ट ने कहा कि दूसरी जमानत पर पूर्ण रोक नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के कल्याण चंद्र सरकार बनाम राजेश रंजन मामले में तय सिद्धांत के अनुसार पहली अर्जी खारिज करने के आधारों को महत्व देना होगा।

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ठोस बदली हुई परिस्थिति के बिना वही आधार दोबारा नहीं उठाए जा सकते। ट्रायल की प्रगति प्रासंगिक है, पर अपने आप में जमानत का आधार नहीं। कोर्ट के अनुसार आरोपित ने यह स्पष्ट नहीं किया कि उसे कौन-सा विशेष बचाव साक्ष्य जुटाना है और वह जेल में रहते हुए वकील के जरिये ऐसा क्यों नहीं कर सकता। जेल में रहने से बचाव में कठिनाई होने का सामान्य कथन पर्याप्त नहीं है। प्रभावी बचाव का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे यांत्रिक ढंग से स्वतंत्र आधार नहीं बनाया जा सकता।