पुलिस कार्रवाई को लेकर FIR का आदेश देते वक्त अतिरिक्त सावधानी बरतें अदालतें, इलाहाबाद HC का सख्त आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अदालतों को पुलिस कार्रवाई के खिलाफ FIR का आदेश देते समय अतिरिक्त सावधानी बरतने का निर्देश ...और पढ़ें

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की फाइल फोटो।
HighLights
हाई कोर्ट ने सभी जिला जजों, डीएम व एसपी को दिए निर्देश
महाराजगंज की एससी-एसटी स्पेशल कोर्ट का आदेश रद किया
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि ड्यूटी के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर एफआइआर दर्ज करने का आदेश देते समय अदालतें अतिरिक्त सावधानी बरतें। न्यायमूर्ति संतोष राय की एकलपीठ ने महाराजगंज में 20 से अधिक पुलिस कर्मियों के खिलाफ एससी-एसटी विशेष अदालत का आदेश रद करते हुए यह आदेश दिया है। साथ ही सभी जिला जजों, जिलाधिकारियों और पुलिस अधिकारियों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। यह आदेश उपनिरीक्षक राकेश कुमार यादव की अपील पर दिया है।
तथ्य यह हैं कि थाना घुघुली के बसंतपुर गांव की दो महिलाओं ने बीएनएसएस की धारा 173(4) के तहत अर्जी दी थी कि 6-7 जून 2026 की रात एसआइ राकेश यादव, कांस्टेबल अमित और 20 पुलिसकर्मी बिना महिला पुलिस कांस्टेबल व वारंट उनके घर में घुसे, अभद्रता के साथ जातिसूचक टिप्पणी की।
विशेष जज ने 11 अगस्त 2026 को थानाध्यक्ष को बीएनएस की धाराओं व एससी-एसटी एक्ट में प्राथमिकी का आदेश दे दिया। अपीलार्थी पुलिसकर्मियों का कहना था कि वे झगड़े के बाद कानून-व्यवस्था के सिलसिले में ड्यूटी पर थे। शिकायत उसी का बदला है। घटना घर के अंदर की है, इसलिए एससी-एसटी एक्ट के लिए जरूरी ‘पब्लिक व्यू’ की शर्त पूरी नहीं होती।
हाई कोर्ट ने कहा, मजिस्ट्रेट को शपथपत्र वाली अर्जी पर विचार कर जरूरी जांच करने के साथ -साथ पुलिस का भी पक्ष सुनना चाहिए। विशेष जज ने ना तो यह बताया कि जांच क्यों जरूरी नहीं समझी, न ही खुद मंगाई गई पुलिस रिपोर्ट पर विचार किया।
जीडी एंट्री और उसी दिन परिवार के लोगों की गिरफ्तारी से पुलिस की मौजूदगी तथा ड्यूटी का प्रथम दृष्टया संबंध दिख रहा था। शिकायतकर्ता अंजू क्रास केस की वादी और दूसरे केस में आरोपित की पत्नी है। आरोपित उपनिरीक्षक दोनों मामलों का विवेचक था। इससे शिकायत के पीछे हित का अनुमान लगता है।
कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों के लिए जारी निर्देश में कहा है कि धारा 173(4)/175(3) पर आदेश से पहले संबंधित पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट या पक्ष पर विचार अनिवार्य हो। आवेदक ने धारा 173 की प्रक्रिया अपनाई या नहीं, यह देखना होगा। धारा 175(4) स्वतंत्र नहीं है, वह 175(3) की सुरक्षा को खत्म नहीं कर सकती। दोनों को साथ पढ़ा जाए।
यदि कार्य ड्यूटी के दौरान हुआ लगे तो आदेश में स्पष्ट निष्कर्ष हो कि उसका ड्यूटी से उचित संबंध है या नहीं। जहां आरोपित पुलिसकर्मी ने पहले ही शिकायतकर्ता के खिलाफ केस, गिरफ्तारी या विवेचना की हो, वहां अतिरिक्त न्यायिक सावधानी बरती जाए। धारा 175(3) की जांच मिनी ट्रायल नहीं होगी, सिर्फ उतनी होगी जितनी न्यायिक विवेक के लिए जरूरी हो। हर आदेश तर्कसंगत होगा।
वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट उचित समय में न आए तो अदालत अनिश्चित प्रतीक्षा किए बिना आगे बढ़ सकती है। कोर्ट ने फैसले की प्रति सभी जजों, जेटीआरआइ लखनऊ और जिलाधिकारियों के साथ पुलिस आयुक्तों को भेजने का आदेश दिया है। कहा है कि जिला एवं सत्र न्यायाधीश निर्देशों की अनुपालन की निगरानी मासिक बैठकों में करें।
