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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मेडिकल जांच से इनकार पर नहीं रोक सकते पीड़िता का मुआवजा

Published: Sat, 24 Oct 2026 12:16 AM (GMT+05:30)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि यौन हिंसा की पीड़िता को मेडिकल जांच के लिए सहमति न देने पर सरकारी मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता।

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HighLights

  1. यौन हिंसा पीड़िता को मेडिकल जांच सहमति न देने पर मुआवजा मिलेगा।

  2. हाई कोर्ट ने मुआवजा रोकने वाली नियमावली की शर्त असंवैधानिक बताई।

  3. नाबालिग पीड़िता को दस दिन में तीन लाख रुपये देने का आदेश।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि यौन हिंसा की पीड़िता को मेडिकल जांच के लिए सहमति नहीं देने के आधार पर सरकारी मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष नियमावली, 2015 की उस शर्त को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जिसके तहत चोट संबंधी मेडिकल रिपोर्ट नहीं होने पर मुआवजा रोक दिया जाता था। कोर्ट ने राज्य सरकार को नाबालिग पीड़िता को 10 दिन के भीतर तीन लाख रुपये की सहायता देने का आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि मेडिकल जांच के लिए सहमति देना पीड़िता का कानूनी अधिकार है। चोट संबंधी रिपोर्ट नहीं होने पर मुआवजा रोकना मनमाना है और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। योजना का उद्देश्य अपराध की पीड़ित महिलाओं और बच्चियों को आर्थिक सहायता तथा जरूरी मदद उपलब्ध कराना है।

मामला जौनपुर का है। 28 जनवरी 2024 को शाहगंज थाने में आठ वर्षीय बच्ची के साथ यौन हिंसा की प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। आठ मार्च को बच्ची को मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया, लेकिन परिवार ने इसकी सहमति नहीं दी। इसलिए चोट संबंधी रिपोर्ट नहीं बन सकी।

हाई कोर्ट में दाखिल की याचिका 

पुलिस ने 20 मार्च को आरोपपत्र दाखिल किया और आरोपित को गिरफ्तार कर लिया। मुकदमे की सुनवाई अभी चल रही है। पीड़िता की मां ने सम्मान कोष से आर्थिक सहायता मांगी, लेकिन जिला स्तरीय समिति ने मेडिकल रिपोर्ट नहीं होने के आधार पर प्रस्ताव खारिज कर दिया। इसके बाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई।

कोर्ट ने कहा कि प्राथमिकी, आरोपपत्र या मेडिकल रिपोर्ट से अपने आप यह तय नहीं होता कि अपराध हुआ है या नहीं। इसका फैसला मुकदमे की सुनवाई करने वाली अदालत करती है। कानून के अनुसार, बिना सहमति किसी की मेडिकल जांच नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि टू-फिंगर टेस्ट जैसे टेस्ट गरिमा के खिलाफ हैं।

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अगर इस शर्त को माना गया तो एक ही अपराध की दो पीड़िताएं बन जाएंगी। एक जिसके पास रिपोर्ट है उसे मदद मिलेगी और दूसरी जिसके पास रिपोर्ट नहीं है उसे नहीं मिलेगी, जबकि दोनों का दर्द और जरूरत एक जैसी है। मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध होने पर अधिकारी उस पर विचार कर सकते हैं, लेकिन रिपोर्ट न होना सहायता रोकने का एकमात्र आधार नहीं बन सकता।