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‘आरोप पत्र व संज्ञान के बाद अवैध गिरफ्तारी पर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सुनवाई योग्य नहीं’

Published: Fri, 29 May 2026 09:11 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि चार्जशीट दाखिल होने और अदालत द्वारा संज्ञान लेने के ...और पढ़ें

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण

HighLights

  1. चार्जशीट के बाद बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका अमान्य।

  2. शुरुआती गिरफ्तारी अनियमितता पर सुनवाई नहीं।

  3. न्यायिक कार्यवाही शुरू होने पर अन्य उपाय उपलब्ध।

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी अभियुक्त के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हो चुकी हो और अदालत संज्ञान ले चुकी हो तथा उस पर कमिटल और ट्रायल की कार्यवाही शुरू हो चुकी हो तो शुरुआती गिरफ्तारी या रिमांड में कथित अनियमितता के आधार पर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने नीरज एवं अन्य की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज करते हुए की है। याची को वर्ष 2024 में ललितपुर कोतवाली में दर्ज दहेज हत्या, हत्या और साजिश जैसे गंभीर आरोपों वाले मुकदमे में गिरफ्तार किया गया था।

याचिका में आरोप था कि गिरफ्तारी के समय उसे लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए और न ही उसके परिजनों को इसकी सूचना दी गई। इससे संविधान के अनुच्छेद 21 और 22(1) तथा बीएनएसएस की धाराओं का उल्लंघन हुआ। इस क्रम में प्रबीर पुरकायस्थ, विहान कुमार, मिहिर राजेश शाह और कासिरेड्डी उपेंद्र रेड्डी मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया गया।

राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल तथा एजीए रूपक चौबे ने दलील दी कि आरोपित वर्तमान में सक्षम अदालत के वैध न्यायिक आदेशों के तहत जेल में निरुद्ध है। चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, संज्ञान लिया जा चुका है, आरोप तय हो चुके हैं और ट्रायल चल रहा है। इसलिए याचिका पोषणीय नहीं है।

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खंडपीठ ने फैसले में कहा कि पुराने संवैधानिक पीठ के फैसलों कानू सान्याल, एके गोपालन, संजय दत्त आदि में यह सिद्धांत स्थापित किया गया है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में हिरासत की वैधता उस समय देखी जाती है जब अदालत मामले की सुनवाई कर रही हो, न कि ट्रायल के किसी स्तर पर देखी जाएगी। एक बार पुलिस जांच पूरी होकर चार्जशीट दाखिल हो जाए और अदालत संज्ञान लेकर आगे की न्यायिक कार्यवाही शुरू कर दे तब शुरुआती रिमांड आदेश का महत्व समाप्त हो जाता है।

इसके बाद आरोपित के पास जमानत या अन्य वैधानिक उपाय उपलब्ध रहते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा है कि हाल के कुछ सुप्रीम कोर्ट फैसलों के आधार पर बड़ी संख्या में आरोपित ट्रायल शुरू होने, गवाहों के बयान दर्ज होने और जमानत खारिज होने के बाद भी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (हेबियस कार्पस) दाखिल कर रहे हैं, इससे ऐसे मुकदमों अधिकता हो गई है और न्यायिक व्यवस्था में ‘असंतुलन’ की स्थिति पैदा हो रही है।