जब तक अभिव्यक्ति कानून या सेवा नियम का उल्लंघन न करे, कदाचार नहीं: इलाहाबाद हाई कोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि सार्वजनिक हित से जुड़ी अनियमितता उजागर करना कदाचार नहीं, जब तक यह कानून या सेवा नियम का उल्लंघन न करे।

इलाहाबाद हाई कोर्ट।

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विधि संवाददाता, प्रयागराज। सरकारी कर्मचारियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
कहा है कि यदि कोई नागरिक संविधान के अनुच्छेद 19(1) क के तहत प्राप्त मौलिक अधिकार का प्रयोग करते हुए सार्वजनिक हित से जुड़ी किसी गलती या अनियमितता को उजागर करता है तो उसे केवल इसी आधार पर ‘कदाचार’ मानकर दंडित नहीं किया जा सकता।
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने फिरोजाबाद के विकास खंड एका स्थित प्राथमिक विद्यालय भदाना-द्वितीय में तैनात सहायक शिक्षक प्रदीप प्रताप सिंह का निलंबन आदेश अवैध मानते हुए निरस्त कर दिया है।
याची ने बेसिक शिक्षा अधिकारी की तरफ से चार जुलाई 2026 को जारी निलंबन आदेश को चुनौती देते हुए मांग की थी कि उन्हें स्कूल में कार्य करने से न रोका जाए। पीठ ने कहा कि पत्रावली से स्पष्ट है कि निलंबन का एकमात्र कारण याची द्वारा इंटरनेट पर भाजपा जिला अध्यक्ष के कथित आचरण को उजागर करना था।
प्रथम दृष्टया इस अदालत की राय है कि कोई नागरिक अपने मौलिक अधिकार का प्रयोग करते हुए सार्वजनिक हित से जुड़े किसी गलत काम, गबन या अनियमितता को उजागर करता है तो उसे केवल इसी आधार पर कदाचार नहीं माना जा सकता, जब तक ऐसी अभिव्यक्ति किसी कानून या लागू सेवा नियम का उल्लंघन न करती हो।
कोर्ट ने निलंबन आदेश को मनमाना, अवैध और विधि सम्मत नहीं मानते हुए रद कर दिया। याची का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे और अधिवक्ता कमलेंद्र पाल सिंह ने रखा। न्यायालय को बताया कि शिक्षक पर आरोप है कि उन्होंने इंटरनेट मीडिया पर भारतीय जनता पार्टी के फिरोजाबाद जिला अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह की कथित गलतियों से जुड़ी कुछ पोस्ट साझा की थीं।
बेसिक शिक्षा अधिकारी ने पहले याची को पोस्ट हटाने का निर्देश दिया था। मना करने पर निलंबन का आदेश जारी कर दिया गया। यह कार्रवाई जिला अध्यक्ष के दबाव में की गई है। कारण बताओ सूचना का जवाब देने के बाद भी उनके स्पष्टीकरण पर विचार नहीं किया गया।
