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पॉक्सो एक्ट के अनुचित उपयोग पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जताई चिंता, विधि आयोग से कहा- संशोधन पर विचार करें

By Jagran NewsEdited By: Sachin Sharma
Published: Tue, 13 Oct 2026 08:13 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के अनुचित उपयोग पर गंभीर चिंता व्यक्त की है, विशेषकर अशिक्षा और गरीबी के कारण उत्पन्न होने वाले मामलों में।

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HighLights

  1. पॉक्सो एक्ट के अनुचित उपयोग पर हाई कोर्ट चिंतित।

  2. विधि आयोग को संशोधन पर विचार का निर्देश।

  3. अशिक्षा, गरीबी के कारण ऐसे मामले होते हैं।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नाबालिग के साथ भागकर शादी करने के मामले में पॉक्सो एक्ट के अनुचित उपयोग पर गंभीर चिंता जताई है। कहा है कि कई बार अशिक्षा और गरीबी के कारण ऐसे मामले होते हैं। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने यह टिप्पणी बांदा निवासी युवक की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका निस्तारित करते हुए की है। साथ ही विधि आयोग को आदेश की प्रति भेजकर भारतीय सामाजिक परिपेक्ष्य में पाक्सो में संशोधन पर विचार के लिए कहा है।

याची के खिलाफ पॉक्सो एक्ट में केस दर्ज था। वह पीड़िता के साथ भागकर साथ रहने लगा। पहली सितंबर 2025 को पति-पत्नी के रूप में शपथ पत्र बनवाया। पीड़िता के पिता ने कहा कि पीड़िता की जन्मतिथि 25 जुलाई 2010 है, वह नाबालिग है। बरामदगी के बाद उसे बाल गृह भेजा गया, वहां उसने बच्चे को जन्म दिया, जो अब दो महीने से अधिक का है।

पीड़िता के पिता को आपत्ति इस बात पर थी कि दोनों याची सपिंड रिश्ते (सात पीढ़ी के भीतर रक्त के संबंधी) में हैं, इसलिए शादी नहीं हो सकती। कोर्ट ने कहा- संबंध शादी के दावे से आगे बढ़कर बच्चे के जन्म तक पहुंच चुका है। कोर्ट को पीड़िता ने बताया कि वह सिर्फ कक्षा पांच तक पढ़ी है।

हिंदी अखबार नहीं पढ़ सकती, सिर्फ हस्ताक्षर कर सकती है। कोर्ट ने कहा, ‘कानून बनाते समय यह नहीं देखा गया कि देश की बड़ी आबादी निरक्षर या अर्धसाक्षर है, 15 साल के बच्चे में शारीरिक-भावनात्मक परिपक्वता पर आकर्षण स्वाभाविक है। राज्य को चाहिए कि नाबालिग को बालिग होने तक शिक्षा और रोजगारपरक कौशल से जोड़े।’

कोर्ट ने कहा, विशेष जज को अपवादस्वरूप मामलों में सजा तय करने का विवेकाधिकार देने और सामुदायिक सेवा जैसी वैकल्पिक सजा पर विधि आयोग विचार करे ताकि अज्ञानता में बने परिवार को 18 साल से कम की सुरक्षा के नाम पर तोड़ा न जाए।

कोर्ट इस आधार पर कि रिकॉर्ड पर सिर्फ कक्षा पांच का ट्रांसफर सर्टिफिकेट है, नगरपालिका का जन्म प्रमाण पत्र नहीं है और ओसिफिकेशन टेस्ट (सटीक उम्र की जांच)में उम्र लगभग 18 वर्ष आई है, पीड़िता को बालिग मानते हुए पति के साथ कोर्ट परिसर से ही जाने की अनुमति दी। साथ ही स्पष्ट किया है कि उसकी तथ्यात्मक टिप्पणी का ट्रायल कोर्ट पर कोई असर नहीं होगा।

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