जहर देकर तीन बेटों की हत्या में उम्रकैद की सजा काट रही मां को इलाहाबाद HC से राहत, सबूतों के अभाव में बरी
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मुरादाबाद में अपने तीन बेटों को जहर देकर मारने के मामले में उम्रकैद की सजा काट ...और पढ़ें

इलाहाबाद उच्च न्यायालय।
HighLights
कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए तत्काल रिहा करने का आदेश दिया
मुरादाबाद की सत्र अदालत ने महिला को सुनाई थी उम्रकैद की सजा
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मुरादाबाद में अपने तीन बेटों को जहर देकर मारने के मामले में उम्रकैद की सजा काट रही मधु को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति मनोज बजाज और न्यायमूर्ति हरवीर सिंह की खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए मधु को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।
तीन मासूम मृत मिले थे
अभियोजन कथानक के अनुसार 18 सितंबर 2012 को सिविल लाइंस क्षेत्र में मधु के बेटे अभिषेक (9) गुड्डू (7) और सूरज (5) मृत मिले थे। पुलिस को मधु के भाई पवन कुमार ने सूचना दी थी। शुरुआत में एफआईआर दर्ज नहीं हुई। चार दिन बाद 22 सितंबर को बच्चों के पिता बाबूराम की शिकायत पर मुकदमा दर्ज किया गया। आरोप लगाया कि पांच साल पहले अलग हो चुकी पत्नी ने दोबारा शादी में बच्चों को बाधा मानकर उन्हें जहर दिया।
23 सितंबर 2012 में मधु गिरफ्तार हुई
मधु को 23 सितंबर 2012 को गिरफ्तार किया गया। अतिरिक्त सत्र अदालत ने 26 अगस्त 2015 को दोषी ठहराकर उम्रकैद की सजा सुनाई थी, तबसे वह जेल में थी। कोर्ट ने कहा कि रोटी-सब्जी, तेल और दूध के नमूने लेने का कोई मेमो नहीं बनाया गया। यह भी साबित नहीं हुआ कि नमूने कहां से और किसके कहने पर लिए गए। उन्हें छह दिन बाद फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया और जांच अधिकारी की गवाही में इसका जिक्र नहीं था।
गवाह के बयान की पुष्टि नहीं हुई
पोस्टमार्टम में बच्चों के पेट में खाना नहीं मिला। जहर केवल रोटी-सब्जी में पाया गया, दूध में नहीं। मधु की निशानदेही पर मिले खाली प्लास्टिक डिब्बे की जांच नहीं हुई और जहर भी बरामद नहीं हुआ। घटना के समय मधु की मौजूदगी भी साबित नहीं हुई। अलगाव के बाद पिता का पत्नी या बच्चों से संपर्क होने का प्रमाण नहीं था। गवाह प्रतीक रस्तोगी के बयान की पुष्टि नहीं हुई।
अधीनस्थ अदालत ने विसंगतियों को नजरअंदाज किया
कॉल डिटेल रिकार्ड से बातचीत साबित नहीं हुई, मोबाइल अन्य लोगों के नाम पर थे और प्रतीक मुकदमे के दौरान पेश नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 अभियोजन की कमियां भरने के लिए नहीं है। परिस्थितिजन्य साक्ष्य से दोष साबित करने वाली पूरी कड़ी पेश नहीं की गई। अधीनस्थ अदालत ने गंभीर विसंगतियों को नजरअंदाज किया, इसलिए सजा कायम रखना असुरक्षित था।
