इमारतों की सेहत बताएगी तकनीक, दरार पड़ने से पहले मिलेगी खतरे की आहट; देश-विदेश के विशेषज्ञ प्रयागराज में मंथन को जुटे
प्रयागराज में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विशेषज्ञों ने इमारतों, पुलों और फ्लाईओवरों की सुरक्षा के लिए नई तकनीकों पर चर्चा ...और पढ़ें

प्रयागराज के एमएनएनआईटी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में स्मारिका का विमोचन करते अतिथि। जागरण
HighLights
बिना सेंसर छुए भी पता चलेगी इमारतों की सेहत, लेजर और AI पहचानेंगे दरार और कंपन
एमएनएनआइटी में सिविल इंजीनियरिंग विभाग की ओर से शुरू हुआ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। किसी इमारत, पुल या फ्लाईओवर में दरार दिखाई देने के बाद उसकी मरम्मत करने के बजाय, अगर तकनीक पहले ही उसके कमजोर होने का संकेत दे दे तो हादसों को काफी हद तक रोका जा सकता है। भविष्य की इसी ऐसी तकनीकों पर मंथन के लिए देश-विदेश के विशेषज्ञ प्रयागराज में जुटे हैं।
मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआईटी) में गुरुवार को स्ट्रक्चरल हेल्थ मानिटरिंग सोसाइटी के तत्वावधान में शुरू हुए तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के पहले दिन दक्षिण कोरिया के छोनम नेशनल विश्वविद्यालय के स्कूल आफ मैकेनिकल इंजीनियरिंग के प्रो. ग्युहा पार्क ने ऐसी तकनीक साझा कि, जिसमें इमारत, पुल या फ्लाईओवर में सेंसर लगाए बिना ही एआइ, मशीन लर्निंग, लेजर के जरिए रियल-टाइम निगरानी की जा सकेगी।
इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता है कि इमारतों, पुलों और औद्योगिक संरचनाओं की मजबूती जांचने के लिए अब सेंसर लगाने की जरूरत कम होगी। प्रो. ग्युहा पार्क ने बताया कि लेजर, कैमरा, इमेज प्रोसेसिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीक से दूर से ही संरचनाओं में होने वाले कंपन, आंतरिक क्षति और सतह की खामियों का पता लगाया जा सकेगा।
नान-कान्टैक्ट सेंसिंग फार स्ट्रक्चरल डायनेमिक्स एंड मानिटरिंग एप्लीकेशंस’ विषय पर व्याख्यान में उन्होंने बताया कि पारंपरिक सेंसर के मुकाबले बिना संपर्क वाली तकनीक कम खर्च में व्यापक क्षेत्र की निगरानी और अधिक सटीक मापन की सुविधा देती है। लेजर आधारित अल्ट्रासोनिक इमेजिंग से धातु और कंपोजिट संरचनाओं के भीतर छिपी क्षति का आकलन किया जा सकता है। वहीं कैमरा आधारित तकनीक से सूक्ष्म कंपन और संरचनाओं की गति का विश्लेषण संभव है।
उन्होंने बताया कि मशीन विजन और एआइ की मदद से कठिन परिस्थितियों में भी निर्माण संबंधी सतही दोषों की पहचान की जा सकती है। इन तकनीकों से संरचनाओं की जांच, समय पर खराबियों का पता लगाने और रखरखाव को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी।
निगरानी से रखरखाव तक बदलेगा इंजीनियरिंग का तरीका
भारतीय स्ट्रक्चरल हेल्थ मानिटरिंग सोसाइटी (आइएसएचएम) के अध्यक्ष और आइआइटी दिल्ली के प्रो. सुरेश भल्ला ने कहा कि इस क्षेत्र में अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और इंजीनियरिंग विशेषज्ञों के बीच सहयोग को लगातार बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि संरचनाओं की निगरानी का उद्देश्य केवल यह जानना नहीं है कि कोई इमारत या पुल कितना सुरक्षित है बल्कि उसके व्यवहार में समय के साथ होने वाले बदलावों को समझना भी है। इससे रखरखाव की योजना अधिक प्रभावी ढंग से बनाई जा सकती है और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हो सकता है।
एमएनएनआईटी के कार्यवाहक निदेशक प्रो. एमएम गोरे ने कहा कि संरचनाओं की सुरक्षा का सीधा संबंध मानव जीवन और जनकल्याण से है। सिविल इंजीनियरिंग विभाग के कार्यवाहक अध्यक्ष प्रो. एनआर रावल तथा सम्मेलन के आयोजन सचिव प्रो. रमा शंकर और डा. वरुण सिंह ने सम्मेलन के उद्देश्यों और सिविल इंजीनियरिंग में स्ट्रक्चरल हेल्थ मानिटरिंग की बढ़ती प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। डा. भरत राजन और डा. स्नेहल के. ने संयुक्त रूप से धन्यवाद ज्ञापन किया।
