प्रतापगढ़ में बदली हाथी की चाल, फिर 2007 वाला फार्मूला; तीन-तीन विधायकों वाली बसपा को अस्तित्व की तलाश
प्रतापगढ़ में बसपा 2027 के चुनावों के लिए अपनी खोई जमीन तलाश रही है, 2007 के 'सोशल इंजीनियरिंग' फॉर्मूले को फिर से अपना रही है।

HighLights
बसपा 2027 चुनाव में प्रतापगढ़ में वापसी की तैयारी में।
मायावती का 'नो गठबंधन' और 'सोशल इंजीनियरिंग' पर जोर।
दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम वोटों से त्रिकोणीय मुकाबला बनाने की रणनीति।
गुरुदीप त्रिपाठी, प्रतापगढ़। जिस जिले में कभी हाथी चिंघाड़ता था, वहां अब उसकी आवाज मंद पड़ गई है। रामपुर खास में कांग्रेस का तिलिस्म, कुंडा-बाबागंज में रघुराज प्रताप सिंह 'राजा भैया' की हनक और बाकी पांच सीटों पर भाजपा-सपा की सीधी कुश्ती के बीच बसपा 2027 में अपनी खोई जमीन तलाश रही है। कभी तीन विधायकों को जिताकर लखनऊ भेजने वाली बसपा के लिए अब यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई बन गया है।
दरअसल, बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस बार साफ कर दिया है कि कोई गठबंधन नहीं, सीधे जनता से गठबंधन। यानी 2007 वाला वही पुराना सोशल इंजीनियरिंग का दांव। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने प्रतापगढ़ के सातों सीटों (रामपुर खास, बाबागंज (सु.), कुंडा, विश्वनाथगंज, सदर, पट्टी और रानीगंज) पर चार-चार दावेदारों का पैनल बनाकर जोनल को-आर्डिनेटर को जमीन पर उतार दिया है।
अंदरखाने सबसे बड़ा मंथन मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर है। मायावती ने स्पष्ट किया है कि देखो किस बूथ पर किस बिरादरी का वोट घटा और किसका बढ़ा, टिकट उसी हिसाब से बंटेगा। प्रतापगढ़ में 22 फीसद दलित, 14 ब्राह्मण और 12 फीसद मुस्लिम वोट ही हाथी की संजीवनी है। 2007 में इसी समीकरण ने बसपा को पूर्ण बहुमत दिलाया था।
राह में सबसे बड़े रोड़ा रघुराज
कुंडा और बाबागंज में बसपा की राह में रघुराज प्रताप सिंह दीवार बनकर खड़े हैं। जनसत्ता दल के प्रमुख रघुराज ने हाल ही में तंज कसा था कि विधानसभा में उनकी पार्टी बसपा और कांग्रेस से भी बड़ी है।
ऐसे में बसपा कुंडा में राजपूत बनाम राजपूत की गलती दोहराने के मूड में नहीं है। यहां सर्वसमाज के कुर्मी या ब्राह्मण चेहरे से राजा भैया के एंटी वोट को एकजुट करने की रणनीति है।
आकाश आनंद से युवा कैडर में जोश
पार्टी प्रमुख के भतीजे आकाश आनंद की वापसी के बाद बसपा ने युवाओं को साधने के लिए बूथ स्तर पर कैडर बैठकों को तेज कर दिया है। कैडर आज भी जिंदा है, कमी है तो सिर्फ चेहरे की। ऐसे में इस बार मायावती समय से छह महीने पहले ही प्रभारी घोषित कर देंगी, जो बाद में प्रत्याशी बनेंगे।
सियासी जानकारों की मानें तो अगर बसपा रानीगंज-सदर में ब्राह्मण, पट्टी में मुस्लिम और बाबागंज में दलित-पिछड़ा कार्ड सही चल गई तो प्रतापगढ़ में मुकाबला त्रिकोणीय हो जाएगा। अन्यथा 2022 की तरह हाथी सिर्फ वोट काटता रह जाएगा।
बसपा की चुनावी तैयारी चल रही है। कैडर आधारित कार्यकर्ता ही हमारी पूंजी हैं। पार्टी अनुशासन से काम करती है। चुनाव पूरी ताकत से लड़ा जाएगा। जिले की रूपरेखा बन रही है।
- सुशील गौतम, जिलाध्यक्ष बसपा।
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