बंदरों को फल खिलाने वाले सावधान! आपकी एक गलती से बाघ और तेंदुओं पर मंडराया जान का खतरा, गिद्धों जैसा न हो जाए हाल
पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बंदरों को फल खिलाना वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि बाजार ...और पढ़ें

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HighLights
बंदर ही नहीं जंगल की पूरी खाद्य शृंखला में जहर घुलने की आशंका
डाइक्लोफेनाक इंजेक्शन से गिद्धों पर मंडराए संकट से भी नहीं लिया सबक
सृजित अवस्थी, पीलीभीत। तीन दिन पहले माला रेंज से गुजरती ट्रेन से भोजन फेंकते यात्री का वीडियो इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित हुआ था। कई अन्य लोग भी जंगल में बंदरों को केले, पूड़ी आदि देते हैं। इस पर वन्यजीव विशेषज्ञों ने चिंता जताई कि इससे जंगल की फूड चेन पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है। केले या अन्य फलों को कैल्शियम कार्बाइड से पकाया जाता, जिसमें फास्फोरस व आर्सेनिक होता है।
यदि ऐसे फल बंदरों को खिलाए गए तो उनके लिवर व किडनी खराब हो सकती है। अन्य दुष्प्रभाव भी होंगे। ऐसे में बाघ, तेंदुए यदि इन बंदरों का शिकार करेंगे तो बीमारियां उन तक भी पहुंच जाएगी।
पीलीभीत टाइगर रिजर्व के पशु चिकित्साधिकारी दक्ष गंगवार के अनुसार, इससे पहले, पशुओं में डाइक्लोफिनेक के उपयोग से गिद्धों पर संकट आ चुका। जंगल की फूड चेन में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

पीटीआर से गुजरने वाले मार्गों पर सफर के दौरान बंदर समेत अन्य छोटे वन्यजीवों को भोजन देना एक आम बात हो गई है। लोग पुण्य कमाने या महज रोमांच के लिए सड़क किनारे बैठे जीवों को फल और बाजार के अन्य खाद्य पदार्थ खिलाते हैं।
राहगीरों को लगता है कि वे जीवों पर परोपकार कर रहे हैं, लेकिन असल में यह आदत जंगल की पूरी खाद्य शृंखला में धीमा जहर घोल रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कृत्रिम आहार भोजन श्रंखला में शीर्ष पर बैठे शिकारियों के अस्तित्व के लिए एक बड़ा संकट बन सकता है।
आमतौर पर बाजार में बिकने वाले फलों को आकर्षक बनाने और उन्हें जल्दी पकाने के लिए कई तरह के हानिकारक रसायनों का इस्तेमाल होता है। फलों को रातों-रात पकाने के लिए आमतौर पर कैल्शियम कार्बाइड और इथेफान जैसे रसायनों का प्रयोग किया जाता है।
जबकि फसलों को बचाने के लिए उन पर जहरीले कीटनाशकों का छिड़काव होता है। जब बंदर या अन्य जीव इन फलों को छिलके समेत खाते हैं, तो ये विषैले रसायन सीधे उनके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।
पीटीआर के पशु चिकित्साधिकारी डाॅ. दक्ष गंगवार के अनुसार, इन रसायनों के लगातार सेवन से छोटे जीवों में लिवर और किडनी की विफलता, पाचन तंत्र की गड़बड़ी और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी गंभीर बीमारियां पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है।
इसका असर उनकी प्रजनन क्षमता पर भी पड़ता है। विज्ञान की भाषा में इस खतरे को बायोमैग्निफिकेशन (जैविक आवर्धन) कहा जाता है। रसायनों का यह जहर छोटे जीवों के शरीर के टिश्यू और वसा में जाकर इकठ्ठा हो जाता है।
पीटीआर में बाघ और तेंदुए अक्सर आसान शिकार की तलाश में जंगल के किनारे भटकने वाले बंदरों का शिकार करते हैं। जब कोई बड़ा शिकारी वन्यजीव रसायन युक्त फल खाने वाले बंदर को अपना निवाला बनाता है, तो वह जहर उस बड़े शिकारी के शरीर में पहुंच जाता है।
लंबे समय तक ऐसा होने से उन शिकारी वन्यजीवों की इम्युनिटी कमजोर हो सकती है। यह वन्यजीव संरक्षण के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है।
गिद्धों के विलुप्त होने से लें सबक
डाॅ. दक्ष बताते हैं कि रसायनों का वन्यजीवों पर क्या असर होता है, इसका सबसे भयावह उदाहरण गिद्ध हैं। एक समय आसमान में मंडराने वाले गिद्ध आज विलुप्ति की कगार पर हैं। इसका मुख्य कारण पशुओं को दी जाने वाली दर्द निवारक दवा डिक्लोफिनेक थी।
डिक्लोफिनेक युक्त मृत मवेशियों का मांस खाने से गिद्धों की किडनी फेल होने लगीं और देखते ही देखते उनकी पूरी आबादी कम होने लगी। हमें इस त्रासदी से सबक लेते हुए वन्यजीवों के प्राकृतिक आहार तंत्र में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।
बाजार के फलों में मौजूद कीटनाशक और कृत्रिम रसायन छोटे जीवों के शरीर में जमा हो जाते हैं। जब बड़े मांसाहारी जीव इनका शिकार करते हैं, तो रसायनों का यह संचय उनके लिए जानलेवा साबित हो सकता है। वन्यजीवों को बाहरी भोजन देना उनके जीवन चक्र और जंगल के प्राकृतिक इकोसिस्टम के लिए खतरनाक होता है। ऐसा करने से बचना चाहिए।
- डाॅ. दक्ष गंगवार, पशु चिकित्साधिकारी, पीटीआर
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