पीलीभीत वोट कांड: 2 SDM सस्पेंड, पर असली खिलाड़ी कौन? नेताजी के 'कोठी' वाले दो खास किरदारों पर टिकी सुई
पीलीभीत मतदाता सूची में 10,470 नामों की गड़बड़ी के मामले में दो एसडीएम निलंबित किए गए हैं, जबकि पांच एईआरओ ...और पढ़ें

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HighLights
पांच एईआरओ की भूमिका संदिग्ध होने पर चल रहीं, विपक्ष के निशाने पर जनप्रतिनिधि
जागरण संवाददाता, पीलीभीत। सदर विधानसभा 10,470 मतदाताओं के नाम बदलकर फर्जीवाड़ा करने के मामले में तत्कालीन ईआरओ अमरिया के एसडीएम रहे मयंक गोस्वामी और हेमंत कुमार चौधरी को निलंबित किया जा चुका है। पांच एईआरओ की भूमिका संदिग्ध मानते हुए मामले की जांच कराई जा रही है।
इस कार्रवाई की गाज बीएलओ तक पहुंच सकती है, लेकिन आखिर इससे अधिकारियों को फायदा क्या था और उन्होंने ऐसा कृत्य किसको फायदा पहुंचाने और किसके इशारे पर किया।
अब तक यह न तो पुलिस की जांच में हुआ और न ही अधिकारियों ने इस पर कोई जवाब दिया। दोनों एसडीएम के निलंबन के बावजूद संतुष्ट न होकर विपक्ष के निशाने पर अब भी एक जनप्रतिनिधि हैं।
सपा नेता ने अपने बयानों में आरोप लगाया था कि इस कांड को करने में अधिकारियों के अलावा दो बाहरियों की भूमिका भी थी, जिनके पास कोठी के अंदर जाने का एक्सेस था। इसमें एक नेताजी का करीबी है तो दूसरा रिश्तेदार बताया जा रहा है।
शहर विधानसभा की मतदाता सूची में 150 पोलिंग बूथों पर अमरिया तहसील में 10,470 वोटरों के नाम फर्जी तरीके से बदले जाने के मामले हेमंत चौधरी, मयंक गोस्वामी व मतदाता पंजीकरण केंद्र के कंप्यूटर आपरेटर अनिल कुमार पर 23 अक्टूबर को प्राथमिकी पंजीकृत कराई गई थी।
इसके बाद दोनों ईआरओ को निलंबित किया जा चुका है। वहीं, आरोपितों के विरुद्ध पंजीकृत की गई प्राथमिकी की जांच भी क्या हुई इस पर पुलिस बताने से बच रही है।
प्रशासन अब 10,470 वोटरों के नाम सही कराने के लिए नाम परिवर्तन आवेदन (फार्म-आठ) के माध्यम से कराए जाएंगे, जिस पर निर्वाचन से जुड़े अधिकारियों कर्मचारियों का फोकस है।
मतदाता सूची जैसे दस्तावेज में गड़बड़ी कराने के आरोपितों से ज्यादा मामले का राजफाश कराने में अहम भूमिका निभाने वाले कांग्रेस और सपा नेताओं ने एक जनप्रतिनिधि का नाम लिया था।
आरोप लगाए थे कि जनप्रतिनिधि के इशारे पर ही लोगों के वोट काटे गए और इसका केंद्र उनकी कोठी के पास का कार्यालय था, जिसमें महज दो लोगों को आने-जाने की ही अनुमति थी।
बताया जा रहा है जिस जनप्रतिनिधि पर आरोप लगाया गया, उस कोठी में उनके एक रिश्तेदार और दूसरे एक करीबी को ही आने-जाने की अनुमति थी।
इतने गंभीर आरोपों के बावजूद न तो उन जनप्रतिनिधि का नाम पुलिस जांच में शामिल किया गया और न ही उनके विरुद्ध पार्टी की ओर से कोई कार्रवाई की गई।
ऐसा तब है जब वह विपक्ष के निशाने पर लगातार रहे और निर्वाचन आयोग के साथ ही पार्टी की छवि को भी धूमिल कर रहे हैं। इस मामले की जांच में ऐसे कई किरदार सामने आएंगे, जो अब तक छिपे हुए हैं।
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