आंखें छीन गईं पर हौसला नहीं: 30 साल से अंधेरे में रहने वाले रविंद्र हाथों के स्पर्श से गढ़ रहे मां लक्ष्मी की मूर्तियां
पीलीभीत के नौजलिया निवासी नेत्रहीन रविंद्र मंडल 30 साल से आंखों की रोशनी न होने के बावजूद मिट्टी से देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाएं गढ़ते हैं।

रविन्द्र
HighLights
कोलकाता से सीखी मूर्ति बनाने की कला से चला रहे परिवार की गुजर-बसर
वैभव मिश्रा, पीलीभीत। न्यूरिया क्षेत्र के नौजलिया निवासी रविंद्र मंडल के लिए मिट्टी जिंदगी का सहारा और आत्मसम्मान की पहचान है। दोनों आंखों से दिव्यांग रविंद्र को 30 वर्ष से दिखाई नहीं देता, लेकिन उनके हाथों में ऐसी कला है कि मिट्टी से देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाएं गढ़ देते हैं।
दीपावली पर जब लोग घरों में लक्ष्मी-गणेश की पूजा की तैयारी कर रहे हैं, तब रविंद्र अपनी उंगलियों के हुनर से इन प्रतिमाओं को आकार देने में जुटे हैं। आंखों की रोशनी छिनने के बाद भी उन्होंने न तो अपना हुनर छोड़ा और न ही मेहनत से मुंह मोड़ा।
रविंद्र मंडल बचपन से ही मूर्तियां बनाने का काम कर रहे हैं। इस कला को निखारने के लिए उन्होंने कोलकाता जाकर प्रशिक्षण लिया था। वहां से लौटने के बाद वह बंगाली समाज की विभिन्न कालोनियों में जाकर दुर्गा पूजा और काली पूजा के लिए प्रतिमाएं तैयार करते थे।
उस समय वह देवी-देवताओं के स्वरूप को देखकर मूर्तियां बनाते थे। तीन दशक पहले बीमारी के कारण उनकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई। जिंदगी का यह बड़ा झटका था।
मगर, वर्षों के अभ्यास ने उनके हाथों को इतना हुनरमंद बना दिया था कि आंखों की रोशनी जाने के बाद भी उन्होंने मूर्ति निर्माण का काम जारी रखा। अब मिट्टी को छूकर उसकी बनावट और आकार का अंदाजा लगाते हुए प्रतिमाओं को तैयार करते हैं।
पहले वह पूजा आयोजनों के लिए कालोनियों में जाकर मूर्तियां बनाते थे, लेकिन अब घर पर ही आर्डर मिलने पर प्रतिमाएं तैयार करते हैं। काली माता, दुर्गा माता, लक्ष्मी माता, गणेश भगवान और भगवान शंकर समेत कई देवी-देवताओं की मूर्तियां उनके हाथों से आकार लेती हैं।
दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाओं के आर्डर मिलने से उनके काम में तेजी आई है। उनके लिए यह केवल कला नहीं, बल्कि परिवार का पेट पालने का जरिया भी है। रविंद्र की जिंदगी का संघर्ष केवल आंखों की रोशनी तक सीमित नहीं है।
परिवार में पत्नी सविता मंडल उनका साथ निभाती हैं। बेटा तापेश मंडल मजदूरी करता है और अलग रहता है। बेटी नीलिमा तरफदार की शादी हो चुकी है। ऐसे में रविंद्र और उनकी पत्नी की आजीविका का मुख्य सहारा मूर्तियां बनाने से होने वाली आमदनी है।
सरकारी योजनाओं का लाभ भी उन्हें पूरी तरह नहीं मिल सका है। रविंद्र के पास आवास योजना का मकान नहीं है और नहीं लाल राशन कार्ड बना है। दिव्यांग पेंशन से कुछ मदद मिलती थी।
मगर, वह भी पिछले छह महीने से खाते में नहीं आई है। ऐसे में त्योहार के इस मौसम में भी उन्हें अपने परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए लगातार मेहनत करनी पड़ रही है।
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