आसान शिकार की लत से तराई में बदल रही बाघों की डाइट; PTR में मंडराया 'कान्हा' जैसा बड़ा खतरा
पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बाघों की आसान शिकार (आवारा गोवंश) पर निर्भरता बढ़ रही है, जिससे उनके प्राकृतिक शिकार कौशल ...और पढ़ें

सफारी मार्ग पर गोवंश का शिकार करता बाघ। स्रोत: इंटरनेट मीडिया
HighLights
आसान शिकार के आदी हो रहे तराई के बाघ, कुत्तों के संपर्क से बाघों में बीमारियों का खतरा
सृजित अवस्थी, पीलीभीत। पीटीआर में बाघों के प्राकृतिक व्यवहार और खानपान में चिंताजनक बदलाव देखने को मिल रहा है। जंगल के राजा अपने पारंपरिक शिकार के पीछे दौड़ने के बजाय खेतों और जंगल किनारे घूमने वाले आवारा गोवंश को अपना निवाला बना रहे हैं। तेज भागने वाले वन्यजीवों की तुलना में सुस्त गोवंश का शिकार करना बाघों के लिए बेहद आसान हो रहा है।
कम मेहनत में छककर भोजन मिलने के कारण बाघ अब घने जंगल से निकलकर आबादी का रुख करने लगे हैं। इसने वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। वहीं, इससे गंभीर बीमारियों व आने वाली पीढ़ी पर भी खतरा मंडरा रहा है।
बाघों की इस बदलती आदत के पीछे मानवीय लापरवाही बड़ी वजह है। जब गोवंश दुधारू नहीं रह जाते, तो लोग उन्हें बेसहारा छोड़ देते हैं। पीटीआर से सटे बनकटी रोड सहित कई अन्य मार्गों पर अक्सर लोगों को गोवंश जंगलों में छोड़ते देखा जाता है।

बड़े वाहनों में भरकर पशुओं को जंगल के भीतर उतारा जाता है। बीते वर्ष वन विभाग ने गोवंश से लदा एक ऐसा ही ट्रक पकड़ा था। ग्रामीण भी गोवंश जंगल में छोड़ आते हैं, जिन पर विभाग लगातार कार्रवाई भी करता रहा है।
हाल ही में पीटीआर के सफारी रूट पर गोवंश का शिकार करते हुए एक बाघ का फोटो इंटरनेट मीडिया पर खूब प्रसारित हुआ था। कई अन्य सफारी मार्गों पर भी बाघों को गोवंश का शिकार करते जाता है।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, बाघों का आवारा गोवंश पर निर्भर होना उनकी अगली पीढ़ी के अस्तित्व के लिए बहुत बड़ा खतरा है। बाघ के शावक अपनी मां को देखकर शिकार करना सीखते हैं।
जब उन्हें गोवंश के रूप में आसान शिकार मिल जाता है, तो वे फुर्तीले जीवों को पकड़ने, घात लगाने और छिपकर वार करने का प्राकृतिक कौशल नहीं सीख पाते। जंगल के बाहरी हिस्सों में पलने के कारण इन शावकों में इंसानों का डर भी खत्म हो जाता है।
यही कारण है कि बड़े होने पर ये जंगल के बजाय गन्ने के खेतों में ही अपनी टेरिटरी बना लेते हैं। आबादी के करीब रहने से शिकारियों की नजर में आने या ग्रामीणों के गुस्से का शिकार बनने की आशंका काफी बढ़ जाती है।
स्पिलओवर संक्रमण का मंडरा रहा खतरा
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे खतरनाक पहलू है, आशंकित संक्रमण। बीते वर्षों में एक सुगरकेन बाघ को कुत्तों के साथ अपना शिकार साझा करते हुए देखा गया था। जिसकी तस्वीर कैमरा ट्रैप में कैद हुई थी।
पीटीआर पशुचिकित्साधिकारी डाॅ. दक्ष बताते हैं आवारा कुत्तों और सियारों के संपर्क में आने से बाघों में स्पिलओवर संक्रमण फैलने का गंभीर खतरा रहता है। सबसे घातक कैनाइन डिस्टेंपर वायरस है, जो सीधे बाघ के तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है।
इसके अलावा रेबीज से मस्तिष्क संक्रमण और शावकों में डिहाइड्रेशन व मौत का कारण बनने वाला कैनाइन पार्वोवायरस भी तेजी से फैल सकता है। इस तरह से फैलने वाला संक्रमण वन्यजीव संरक्षण के लिए एक चुनौती बन चुका है।
कान्हा में बिगड़ गए थे हालात
डाॅ. दक्ष ने चेताया कि मवेशियों के जरिए फैलने वाली बीमारियों का खतरा कितना बड़ा है। इसका अंदाजा मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व की घटना से लगाया जा सकता है।
इसी वर्ष मई 2026 में कान्हा में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस फैलने के कारण एक बाघिन और उसके शावकों समेत कुल आठ बाघों की जान चली गई थी। तराई में बाघों की बदलती यह डाइट यदि समय रहते नहीं सुधरी, तो यह किसी बड़े संकट को बुलावा दे सकती है।
वन पारिस्थितिकी तंत्र से बाहरी कुछ भी वन व वन्यजीवों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। कई बार पशुपालक अपने पशु जंगल में छोड़ देते हैं। ऐसा करना न केवल खतरनाक, बल्कि यह एक दंडनीय अपराध है। लोगों से अपील है कि वन एवं वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूक बनें।
- मनीष सिंह, डीएफओ, पीटीआर
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