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हाईटेक पुलिसिंग की दौड़ में पीछे छूटा मुखबिर तंत्र: सर्विलांस पर बढ़ी निर्भरता, बीट पुलिसिंग में संवाद कम

Published: Mon, 02 Nov 2026 04:46 PM (IST)

पुलिसिंग में तकनीक पर बढ़ती निर्भरता के कारण पारंपरिक मुखबिर तंत्र और बीट पुलिसिंग का संवाद कमजोर पड़ रहा है। ...और पढ़ें

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HighLights

  1. बीट पुलिसिंग में भी स्थानीय लोगों से संवाद और सूचनाओं का आदान-प्रदान हुआ कम

वैभव मिश्रा, पीलीभीत। कहते हैं कि पुलिस भले ही हाईटेक हो जाए, लेकिन अपराधियों तक पहुंचने के लिए उसका ह्यूमन नेटवर्क कमजोर नहीं होना चाहिए। अपराध और अपराधियों पर नियंत्रण के लिए तकनीक के साथ मुखबिर तंत्र भी पुलिस की बड़ी ताकत रहा है। एक समय था जब गांव से लेकर शहर तक पुलिस के मुखबिर सक्रिय रहते थे।

चाय की दुकानों से लेकर बाजार और गांव की चौपाल तक पुलिस को सूचनाएं मिलती थीं। बीट पर तैनात सिपाही अपने क्षेत्र के लोगों को जानता था और अपराधियों की गतिविधियों पर नजर रखता था, लेकिन अब सर्विलांस और डिजिटल संसाधनों पर बढ़ती निर्भरता के बीच परंपरागत मुखबिर तंत्र की सक्रियता कम होती दिखाई दे रही है।

वर्तमान में पुलिस अपराधियों तक पहुंचने के लिए सीसीटीवी कैमरों, मोबाइल लोकेशन, डिजिटल फुटप्रिंट और बैंक ट्रांजेक्शन जैसे तकनीकी साक्ष्यों का सहारा ले रही है।

वर्ष 2026 में पीलीभीत पुलिस ने सर्विलांस और एसओजी की मदद से कई बड़ी वारदातों का पर्दाफाश किया। अमरिया तिहरे हत्याकांड, बिलसंडा के कपड़ा व्यापारी हत्याकांड, सुनगढ़ी की चोरी और महिला से लूट समेत कई मामलों में तकनीकी साक्ष्यों से सफलता मिली।

जहानाबाद में 102.54 करोड़ रुपये के संदिग्ध साइबर लेनदेन वाले नेटवर्क का भी पर्दाफाश किया गया। हालांकि, तकनीक के साथ पुलिस का ह्यूमन नेटवर्क मजबूत बनाए रखना भी जरूरी है।

बीट पर कमजोर होती पकड़ चिंता का विषय

बीट पुलिसिंग में तैनात सिपाही की जिम्मेदारी अपने क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, स्थानीय लोगों और संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी रखना है। उसे गांव और मुहल्ले के लोगों से नियमित संपर्क में रहना चाहिए।

पहले बीट के सिपाही की अपने क्षेत्र में अच्छी पहचान होती थी। उसे पता रहता था कि कौन व्यक्ति क्षेत्र में नया आया है और कहां किस तरह की गतिविधियां चल रही हैं। इससे छोटी घटनाओं की जानकारी समय रहते मिल जाती थी। अब बीट पुलिसिंग को और प्रभावी बनाने की जरूरत महसूस हो रही है।

पुलिसकर्मियों की व्यस्तता और सीमित संख्या के बीच क्षेत्र में नियमित भ्रमण और लोगों से संवाद बनाए रखना चुनौती है। इसी कारण से अमरिया में हुए तिहरे हत्याकांड में विवाद पहले से चल रहा था। लेकिन पुलिस को उसकी भनक तक नहीं लगी थी।

केस-1 : 102 करोड़ के अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी नेटवर्क का पर्दाफाश

20 सितंबर को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने का झांसा देकर आम लोगों से आधार, पैन और एटीएम कार्ड हासिल किए जाते थे। इनके नाम पर फर्जी फर्म और बैंक खाते खोले जाते थे।

फिर टेलीग्राम ग्रुप से गेमिंग और इन्वेस्टमेंट फ्राड की रकम ट्रांसफर की जाती थी। पुलिस ने डिजिटल फुटप्रिंट और बैंक ट्रांजैक्शन के आधार पर दो आरोपितों को गिरफ्तार किया। खातों में 102.54 करोड़ रुपये का संदिग्ध लेनदेन मिला।

केस-2 : बुजुर्ग महिला से लूट का 72 घंटे में पर्दाफाश

28 अक्टूबर को दो बदमाश किराये पर कमरा देखने के बहाने बुजुर्ग महिला के घर पहुंचे। बातचीत के दौरान मौका पाकर उनके कानों के टाप्स और मंगलसूत्र लूटकर फरार हो गए।

सुनगढ़ी पुलिस, एसओजी और सर्विलांस टीम ने सीसीटीवी फुटेज से आरोपितों के आने-जाने का रास्ता खंगाला। डिजिटल सर्विलांस की मदद से बरेली के दोनों आरोपितों को 72 घंटे में पकड़कर लूटे आभूषण व वारदात में प्रयुक्त बाइक बरामद की।

केस-3 : साइबर ठगी के 29 लाख रुपये पीड़ितों को वापस दिलाए

12 जून को साइबर ठगी की शिकायतों पर सर्विलांस और साइबर क्राइम सेल ने बैंक खातों में हुए संदिग्ध लेनदेन की जांच की। तकनीकी सर्विलांस और मनी रेस्टोरेशन माड्यूल की मदद से ठगी की रकम को ट्रैक कर संबंधित खातों में फ्रीज कराया गया। इसके बाद कानूनी और बैंकिंग प्रक्रिया पूरी कर 29 लाख रुपये से अधिक की धनराशि वास्तविक पीड़ितों को वापस दिलाने में सफलता मिली।

 

यक्ष एप पुलिस के लिए अपराधियों तक पहुंचने और उनके आपराधिक इतिहास की जानकारी जुटाने में काफी मददगार साबित हो रहा है। इस एप पर अपराधियों से जुड़ा डेटा लगातार अपलोड किया जा रहा है। इससे किसी आरोपित का आपराधिक रिकार्ड, उसकी गतिविधियों और पूर्व में दर्ज मुकदमों की जानकारी आसानी से प्राप्त की जा सकती है। तकनीक के साथ-साथ पुलिस के ह्यूमन नेटवर्क को भी मजबूत किया जा रहा है, ताकि सूचनाओं का बेहतर सत्यापन कर अपराधियों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई की जा सके।

- सुकीर्ति माधव, एसपी


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