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1850 से चली आ रही यह ऐतिहासिक रामलीला, जहां धार्मिक मंचन के बहाने अंग्रेज हुकूमत को दी जाती थी चुनौती

Published: Fri, 06 Nov 2026 12:06 AM (IST)

घुंघचाई की ऐतिहासिक रामलीला 1850 में जमींदार कुंवर लायक सिंह द्वारा शुरू की गई थी, जो अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ...और पढ़ें

पीलीभीत में घुंघचाई का रामलीला मेला स्थल। जागरण

पीलीभीत में घुंघचाई का रामलीला मेला स्थल। जागरण

HighLights

  1. धार्मिक आयोजन के साथ जनजागरण का माध्यम बनी परंपरा, इस बार 22 नवंबर से होगा मंचन

केके शर्मा, घुंघचाई (पीलीभीत)। अंग्रेजी हुकूमत के दौर में देश की आजादी के लिए आवाज उठाना आसान नहीं था। शासन के खिलाफ खुलकर बोलने वालों पर पहरा था और क्रांतिकारियों को पकड़कर जेल में डालने के साथ कड़ी सजा दी जाती थी। ऐसे समय में धार्मिक आयोजन और नाट्य मंचन लोगों तक संदेश पहुंचाने का माध्यम बने।

घुंघचाई की ऐतिहासिक रामलीला इसी विरासत से जुड़ी है। स्थानीय जानकारी के अनुसार जिले में सबसे पहले रामलीला की शुरुआत घुंघचाई गांव में हुई थी।

गांव के जमींदार कुंवर लायक सिंह ने वर्ष 1850 में आसपास के गांवों के लोगों को एकत्र कर रामलीला शुरू कराई थी। इसका आयोजन घुंघचाई के उत्तर दिशा में स्थित बाबा दुग्धाधारी स्थल पर होता था।

उस समय आजादी की चेतना जगाना और लोगों को जागरूक करना चुनौतीपूर्ण था। रामायण के प्रसंगों के मंचन के जरिए लोगों तक क्रांति का संदेश पहुंचाया जाता था। धार्मिक कथाएं मनोरंजन के साथ सत्य, साहस और अन्याय का विरोध करने की प्रेरणा भी देती थीं।

भगवान श्रीराम के संघर्ष, रावण के अत्याचार और धर्म की स्थापना से जुड़े प्रसंग दर्शकों को सत्य की राह पर चलने, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और स्वाभिमान की रक्षा करने का संदेश देते थे।

इस तरह घुंघचाई की रामलीला की पहचान केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रही। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, अंग्रेजी शासन के समय यह सामाजिक चेतना जगाने का एक माध्यम बनी।

इस रामलीला से जुड़ा एक रोचक प्रसंग यह भी बताया जाता है कि अंग्रेज अधिकारी मंचन देखने आते थे। वे कलाकारों की प्रस्तुतियों और रामायण के दृश्यों का आनंद लेते थे।

नाटक में प्रसंगों के जरिए लोगों तक जागरुकता का संदेश पहुंचाया जाता था, लेकिन अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं हो पाती थी। धार्मिक कथा के भीतर छिपे संदेशों के माध्यम से लोगों को अन्याय का विरोध करने और साहस बनाए रखने की प्रेरणा मिलती थी।

पीढ़ियों से निभाई जा रही परंपरा

रामलीला की शुरुआत जमींदार कुंवर लायक सिंह ने कराई थी। इसके बाद उनके पुत्र कुंवर सेवा सिंह और फिर देवी प्रताप सिंह ने परंपरा को आगे बढ़ाया। स्थानीय जानकारी के अनुसार, करीब आठ पीढ़ियों से इसका आयोजन जारी है।

अब पूर्वजों की इस परंपरा को वीरेंद्र प्रताप सिंह निभा रहे हैं। उनके अनुसार, हर साल रामलीला आयोजित की जाती है और इस बार मंचन 22 नवंबर से शुरू होगा। घुंघचाई की रामलीला को जिले की सबसे पुरानी रामलीलाओं में से एक बताया जाता है।

वर्ष 1850 से चली आ रही यह परंपरा करीब 176 वर्ष पुरानी है। आयोजन के लिए रामलीला के नाम डेढ़ एकड़ भूमि भी उपलब्ध है। यह भूमि और पीढ़ी-दर-पीढ़ी जारी मंचन इस सांस्कृतिक विरासत से जुड़े लोगों की आस्था को दर्शाते हैं।

सांस्कृतिक विरासत को सहेज रही है रामलीला

पूर्व प्रधान वीरेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि उनके पूर्वज कुंवर लायक सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत के दौरान लोगों तक क्रांति और जागरुकता का संदेश पहुंचाने के उद्देश्य से रामलीला शुरू कराई थी। वे भी पूर्वजों की परंपरा के अनुसार हर साल इसका आयोजन करा रहे हैं।

समय के साथ बदलाव आए हैं, लेकिन प्रभु श्रीराम की लीलाओं का मंचन जारी है। रामलीला आज भी लोगों को मर्यादा, त्याग, कर्तव्य और सत्य का महत्व बताने के साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को सहेज रही है।

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