ग्रेटर नोएडा में टैक्स बचाने का खेल बना जानलेवा, स्लीपर बसों में यात्रियों के साथ लादा जा रहा सामान
यात्रियों को ढोने वाली स्लीपर बसों में टैक्स बचाने के लिए सामान लादना उनकी जान पर भारी पड़ रहा है, ...और पढ़ें

ग्रेटर नोएडा में बस जलने के बाद जेवर टोल पर स्लीपर बसों की जांच करती यातायात पुलिस।
HighLights
यमुना एक्सप्रेसवे पर बस अग्निकांड में नौ यात्रियों की मौत हुई।
'ऑपरेशन कवच 2.0' के बाद भी बसों में सामान ढुलाई जारी।
टैक्स बचाने के लिए व्यावसायिक सामान यात्रियों की जान ले रहा।
मनोज कुमार शर्मा, जेवर (ग्रेटर नोएडा)। यात्रियों को ढोने वाली डबल डेकर स्लीपर बसों में टैक्स बचाने के लिए सामान लादने का खेल उनकी जान पर भारी पड़ रहा है। जेवर में यमुना एक्सप्रेसवे पर हुए भीषण बस अग्निकांड में नौ यात्रियों की मौत के बाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान से प्रशासन हरकत में आया।
28 से 30 सितंबर आपरेशन कवच 2.0 चलाकर स्लीपर बसों की सघन जांच की गई, लेकिन अभियान थमते ही एक्सप्रेसवे पर फिर वही हालात लौट आए। मंगलवार को नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे पर एक और डबल डेकर स्लीपर बस में आग लग गई।
बस में सवार 35 यात्रियों और लाखों को समान भरा हुआ था लेकिन चालक की सूझबूझ से यात्रियों को समय रहते सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।
स्लीपर बसों पर हुई दिखावटी कार्रवाई
यमुना एक्सप्रेसवे पर 24 सितंबर को हुए बस अग्निकांड में नौ यात्री जिंदा जल गए थे, जिसके बाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान लेने के बाद नियमों को ताक पर रख दौड़ रही स्लीपर बसों के खिलाफ दिखावटी कार्रवाई हुई।
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सूत्रों की माने तो अभियान लांच होने के साथ ही नियमों को रौंदते हुए दौड़ने वाली बसों के संचालकों ने अपनी बसों को सड़कों से हटाकर साइड कर दिया। लेकिन जैसे ही मामला शांत हुआ फिर से उसी पुराने ढर्रे पर बसों को दौड़ना शुरू हो गया।
यमुना एक्सप्रेसवे पर हुए हादसे के बाद बसों की फिटनेस, परमिट, अग्निशमन उपकरण और आपातकालीन निकास के साथ यात्रियों के बीच व्यावसायिक सामान की ढुलाई भी सवालों के घेरे में आई थी।
आरोप है कि टैक्स और परिवहन खर्च बचाने के लिए सामान स्लीपर बसों के जरिये भेजते हैं। इससे बस संचालकों को अतिरिक्त कमाई होती है, जबकि ज्वलनशील या अधिक मात्रा में सामान आग लगने की स्थिति में यात्रियों के लिए खतरा बनता है।
तीन दिन की सख्ती, फिर ढीली निगरानी
यमुना एक्सप्रेसवे हादसे के बाद आपरेशन कवच 2.0 के तहत कार्रवाई से कुछ समय के लिए स्लीपर बस संचालकों में हड़कंप मचा, लेकिन लगातार निगरानी नहीं होने से स्थिति फिर पुराने ढर्रे पर लौटती दिखी।
मंगलवार की घटना ने कार्रवाई की स्थायित्व पर सवाल खड़ा कर दिया है। नौ यात्रियों की मौत, न्यायालयों का संज्ञान और आपरेशन कवच 2.0 की कार्रवाई के बाद भी अगर स्लीपर बसों में सामान ढुलाई जारी है तो तीन दिन की जांच के बाद हासिल क्या हुआ।
अभियान की जरूरत नहीं कार्रवाई से सुधरेगा सिस्टम
हादसे के बाद अभियान चलाने की से कुछ होने जाने वाला नहीं है, बल्कि नियमित जांच की जरूरत है। बसों की फिटनेस और सुरक्षा उपकरणों के साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यात्रियों की सीटों और आपातकालीन रास्तों के बीच व्यावसायिक सामान न भरा जाए।
टैक्स बचाने का कारोबार यात्रियों की जिंदगी की कीमत पर नहीं चल सकता।
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