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मंगल मुद्दा: दुआ करिए आग न लगे! झारखंड में स्लीपर बसों की सुरक्षा पर सवाल, फिटनेस जांच और निगरानी में चौतरफा खामियां

Published: Tue, 29 Sep 2026 07:30 AM (IST)

झारखंड में स्लीपर बसों की सुरक्षा और फिटनेस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आपातकालीन निकास की कमी, फिटनेस के ...और पढ़ें

चार इमरजेंसी एग्जिट जरूरी, कई बसों में नहीं, एग्जिट के पास रखा जा रहा सामान।

चार इमरजेंसी एग्जिट जरूरी, कई बसों में नहीं, एग्जिट के पास रखा जा रहा सामान।

HighLights

  1. स्लीपर बसों में आपातकालीन निकास और मार्ग बाधित होने की शिकायतें।

  2. एमवीआई की भूमिका घटने से फिटनेस जांच और निगरानी कमजोर हुई।

  3. सीमित ऑटोमेटेड सेंटरों पर दबाव, जांच की गुणवत्ता पर उठे सवाल।

शक्ति सिंह, रांची। झारखंड में स्लीपर बसों की संख्या लगातार बढ़ रही है। नई बसें सड़क पर उतर रही हैं तो दूसरे राज्यों की बसें भी परमिट लेकर झारखंड में यात्रियों को लेकर चल रही हैं। लेकिन यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े मानकों को लेकर व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। खासकर पुरानी स्लीपर बसों की स्थिति चिंताजनक है। दिल्ली व यूपी में स्लीपल बसों में हुए हादसे के बाद भी रांची और झारखंड में प्रशासन सबक लेता नहीं दिख रहा है।

जागरण की पड़ताल में कई बसों में निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुरूप इमरजेंसी एग्जिट नहीं हैं। कुछ बसों में चार निकास द्वार की व्यवस्था दिखती है, लेकिन बड़ी संख्या में बसों में यह व्यवस्था पूरी तरह मानक के अनुरूप नहीं है।

इतना ही नहीं, आपातकालीन निकास वाले हिस्से के आसपास सामान और लगेज रखे जाने की शिकायतें भी सामने आती हैं, जबकि आपात स्थिति में यह रास्ता पूरी तरह खाली रहना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल इन बसों की फिटनेस जांच और उसके बाद की निगरानी को लेकर है। वर्तमान व्यवस्था में फिटनेस का बड़ा हिस्सा आटोमेटेड टेस्टिंग सेंटरों पर निर्भर है।

वहीं, मोटरयान निरीक्षकों यानी एमवीआई को पहले की तरह प्रत्यक्ष फिटनेस जांच के बजाय परिवहन विभाग के दूसरे प्रवर्तन और प्रशासनिक कार्यों में लगाया जा रहा है। ऐसे में जिन अधिकारियों के पास वाहनों की तकनीकी स्थिति परखने का अनुभव है, उनकी प्रत्यक्ष भूमिका कम होने से आटोमेटेड सेंटरों की निगरानी और जांच की गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

मशीन फिट बता दे तो बस पूरी तरह सुरक्षित कैसे?

आटोमेटेड टेस्टिंग सेंटर में मशीन से ब्रेक, स्टीयरिंग, सस्पेंशन सहित कई तकनीकी पहलुओं की जांच की जाती है। लेकिन स्लीपर बस की सुरक्षा केवल इन तकनीकी हिस्सों तक सीमित नहीं है।

बस के अंदर बर्थ का लेआउट, इमरजेंसी एग्जिट, निकास का रास्ता, रूफ हैच, फायर डिटेक्शन और फायर सप्रेशन सिस्टम, अग्निरोधी सामग्री तथा बाद में किए गए अनधिकृत बदलाव भी यात्री सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। केंद्रीय नियमों में भी आटोमेटेड टेस्टिंग के दौरान विजुअल और फंक्शनल जांच के पहलुओं को शामिल किया गया है।

मसलन, फिटनेस के समय बस में निर्धारित संख्या में इमरजेंसी एग्जिट हैं, लेकिन बाद में उसी रास्ते के पास लगेज रखने की व्यवस्था कर दी गई तो मशीन आधारित जांच में इसका पता कैसे चलेगा। अतिरिक्त बर्थ या पार्टिशन लगाए गए हैं या नहीं, इसकी जांच कौन करेगा? यही वह बिंदु है जहां प्रशिक्षित तकनीकी अधिकारी की प्रत्यक्ष निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है।

छह सेंटरों पर कई जिलों का दबाव

राज्य में सीमित फिटनेस सेंटरों पर कई जिलों के हजारों वाहनों का दबाव है। रांची के सेंटर पर रांची के अलावा आसपास के जिलों के वाहन पहुंचते हैं। इसी तरह हजारीबाग और धनबाद के सेंटरों पर भी दूसरे जिलों के वाहनों की जांच होती है। एक सेंटर पर बड़ी संख्या में वाहनों की जांच होने की स्थिति में गुणवत्ता नियंत्रण और स्वतंत्र निगरानी और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

फिटनेस सेंटर लग चुके हैं अनियमितता के मामले, एक हो चुका है सील

फिटनेस व्यवस्था में पूर्व में अनियमितता के मामले भी सामने आ चुके हैं। पुलिस थाने में खड़े वाहनों के फिटनेस प्रमाणपत्र जारी होने और निर्धारित जांच के बिना फिटनेस दिए जाने के आरोप लगे हैं। ऐसे मामलों में कार्रवाई भी हुई और एक फिटनेस सेंटर को बंद भी किया जा चुका है। गाड़ी थाने में थी उसका फिटनेस भी हो गया।

इसके बाद यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि सेंटरों की नियमित निगरानी कौन कर रहा है और मशीन से मिले परिणामों का वास्तविक वाहन की स्थिति से मिलान किस स्तर पर हो रहा है।

एक वाहन, कई राज्यों में अलग-अलग दस्तावेज

स्लीपर बसों के संचालन की व्यवस्था भी जांच के दायरे में है। कई बार वाहन एक राज्य का, परमिट दूसरे राज्य का और फिटनेस किसी तीसरे राज्य में कराया जाता है। उदाहरण के तौर पर वाहन बिहार का हो सकता है, परमिट उत्तर प्रदेश का और फिटनेस राजस्थान या किसी अन्य राज्य से कराया गया।

ट्रैक्टर या अन्य वाहनों के फिटनेस के दूसरे राज्य में कितने जाते हैं यह भी जांच वाली बात है। ऐसे वाहनों के झारखंड में यात्रियों को लेकर चलने के दौरान दस्तावेज और वास्तविक वाहन की स्थिति में समानता की जांच कितनी प्रभावी है, यह भी बड़ा सवाल है।

कागज पर फिटनेस प्रमाणपत्र होना और सड़क पर बस का वास्तव में सुरक्षित होना दो अलग बातें हैं। फिटनेस के बाद बस में कोई बदलाव हुआ है या नहीं, इमरजेंसी एग्जिट खुल रहे हैं या नहीं, बर्थ की संख्या और बनावट स्वीकृत डिजाइन के अनुरूप है या नहीं और अग्नि सुरक्षा की व्यवस्था काम कर रही है या नहीं, इसकी नियमित जांच जरूरी है।

हादसों के बाद भी सबक कितना?

24 सितंबर को ग्रेटर नोएडा में यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में आग लगने से नौ यात्रियों की मौत हुई। पुलिस की जांच में इमरजेंसी एग्जिट के काम नहीं करने और बस में सामान के कारण रास्ता बाधित होने जैसे पहलुओं की जांच की जा रही है।

इससे साफ है कि स्लीपर बस की फिटनेस का मतलब केवल ब्रेक, टायर, सस्पेंशन और हेडलाइट का ठीक होना नहीं है। आग या किसी अन्य आपात स्थिति में यात्री कितनी जल्दी बस से बाहर निकल सकता है, यह भी फिटनेस और सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इन मानकों की जांच जरूरी

स्लीपर बस की जांच में बाडी स्ट्रक्चर और आयाम, इमरजेंसी एग्जिट, निकास मार्ग, रूफ एस्केप हैच, बर्थ का लेआउट और मजबूती, सीढ़ी व हैंडहोल्ड, गैंगवे, फायर अलार्म व सप्रेशन सिस्टम, अग्निरोधी सामग्री, ब्रेक-स्टीयरिंग-सस्पेंशन और अनधिकृत बदलाव पर विशेष नजर जरूरी है।

एमवीआई की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल

वाहनों की तकनीकी स्थिति की जांच और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई में मोटरयान निरीक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। अब जब इन्हें फिटनेस जांच से इतर अन्य परिवहन कार्यों में लगाया जा रहा है और फिटनेस व्यवस्था आटोमेटेड सेंटरों पर अधिक निर्भर हो रही है, तब इन सेंटरों की नियमित निगरानी का स्पष्ट तंत्र जरूरी है।

स्लीपर बस में इन 15 मानकों पर नजर जरूरी

  • पहला, बाडी स्ट्रक्चर—बस का ढांचा निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप और पर्याप्त मजबूती वाला होना चाहिए।
  • दूसरा, लंबाई और आयाम—बस की लंबाई और अन्य बाहरी आयाम निर्धारित सीमा में होने चाहिए।
  • तीसरा, इमरजेंसी एग्जिट—आपातकालीन निकास निर्धारित संख्या, आकार और स्थान के अनुरूप होने चाहिए।
  • चौथा, एग्जिट का रास्ता—बर्थ, सीट, सामान या किसी दूसरे निर्माण से इमरजेंसी दरवाजा या निकास बाधित नहीं होना चाहिए।
  • पांचवां, रूफ एस्केप हैच—जहां मानक के अनुसार हैच जरूरी हैं, वहां उनकी उपलब्धता और खुलने की स्थिति जांची जानी चाहिए।
  • छठा, बर्थ लेआउट—बर्थ की संख्या और उसकी स्थिति स्वीकृत डिजाइन तथा पंजीकरण के अनुरूप होनी चाहिए।
  • सातवां, बर्थ की मजबूती—ऊपरी और निचली बर्थ का स्ट्रक्चर यात्रियों के भार और निर्धारित सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए।
  • आठवां, रेस्ट्रेंट व्यवस्था—ऊपरी बर्थ से यात्री के गिरने से बचाने की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • नौवां, सीढ़ी और हैंडहोल्ड—ऊपरी बर्थ पर चढ़ने-उतरने के लिए सुरक्षित सीढ़ी और पकड़ने की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • दसवां, गैंगवे—यात्रियों के आने-जाने और आपात स्थिति में निकलने के लिए रास्ता बाधित नहीं होना चाहिए।
  • 11वां, फायर डिटेक्शन और अलार्म—लागू मानकों के अनुसार आग की पहचान और चेतावनी की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • 12वां, फायर सप्रेशन—जहां अनिवार्य है, वहां अग्निशमन/सप्रेशन प्रणाली निर्धारित मानक के अनुरूप होनी चाहिए।
  • 13वां, अग्निरोधी सामग्री—बस के अंदर इस्तेमाल होने वाली संबंधित सामग्री में लागू अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन होना चाहिए।
  • 14वां, ब्रेक-स्टीयरिंग-सस्पेंशन—मशीन आधारित फिटनेस में इन प्रमुख तकनीकी प्रणालियों की कार्यक्षमता की जांच जरूरी है।
  • 15वां, अनधिकृत बदलाव—फिटनेस के बाद अतिरिक्त बर्थ, पार्टिशन, सामान रखने की व्यवस्था या अन्य संरचनात्मक बदलाव तो नहीं किए गए, इसकी भी जांच जरूरी है।

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