कानपुर-लखनऊ से गंगा एक्सप्रेसवे तक, समय से पहले टूट रही सड़कें; DPR बनाने वाले 50000 में सिर्फ 690 प्रशिक्षित
सड़कों की मजबूती के लिए बेहतर डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) महत्वपूर्ण है, लेकिन कंसल्टेंट पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं ले रहे हैं। ...और पढ़ें

एआई जेनेरेटेड इमेज।
HighLights
कमजोर डीपीआर के कारण एक्सप्रेसवे समय से पहले हो रहे खराब।
कंसल्टेंट डीपीआर प्रशिक्षण को अनिवार्य नहीं समझते, गुणवत्ता प्रभावित।
नोएडा अकादमी में प्रशिक्षण लेने वाले कंसल्टेंट की संख्या बेहद कम।
चेतना राठौर, नोएडा। एक मजबूत सड़क तैयार करने का पहला महत्वपूर्ण चरण उसकी बेहतर विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) होती है। डीपीआर कमजोर होगी तो सड़क भी मजबूती नही होगी। समय से पहले ही वह टूट जाएगी।
इसका सबसे सटीक उदाहरण कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे धसना, दिल्ली देहरादून एक्सप्रसेवे पर गड्ढा होना व गंगा एक्सप्रेसवे का टूटना है। मजबूत प्लानिंग के अभाव में एक्सप्रेसवे समय से पहले दम तोड़ देते हैं। इसका प्रमुख कारण डीपीआर तैयार करने के लिए कंसल्टेट द्वारा समुचित प्रशिक्षण न लेना है।
नोएडा के सेक्टर 62 स्थित भारतीय राजमार्ग अभियंता अकादमी में प्रशिक्षण लेने वाले कंसल्टेंट के आंकड़े हैरान करने वाले हैं। चार वर्षों (2022 से 2026) में महज 690 ने डीपीआर तैयार करने का प्रशिक्षण लिया।
अधिकारियों मुताबिक यह आंकड़ा लगभग 50 हजार होना चाहिए था। उम्मीद से कम कंसल्टेंट प्रशिक्षण लेने पहुंच रहे हैं। प्रशिक्षण के अभाव में ही बेहतर डीपीआर तैयार नहीं कर पाते हैं।
बता दें कि कंसल्टेंट को अकादमी से प्रशिक्षण लेना अनिवार्य है। देशभर में महज भारतीय राजमार्ग अभियंता अकादमी ही इसका प्रशिक्षण देने के लिए योग्य है। मंत्रालय द्वारा अकादमी को डीपीआर का प्रशिक्षण देने की अनुमति सौंपी है। प्रशिक्षण के बाद ही प्रमाणपत्र मिलता है।
प्रमाणपत्र के आधार पर ही मिलता है काम
प्रमाणपत्र के आधार पर किसी भी कंसल्टेंट को सड़क निर्माण के लिए डीपीआर बनाने का काम मिलता है। प्रशिक्षण को अनिवार्य न समझना और ट्रेनिंग न लेने का खामियाजा सड़क पर चलने वाले वालों को परेशानी झेलकर भुगतना पड़ता है।
देश में एक्सप्रेसवे और हाईवे आदि सड़क परियोजनाओं की संख्या को देखते हुए आंकड़ा यह सवाल खड़ा करता है कि जब सड़क परियोजनाओं की शुरूआती तकनीकी नींव रखने वाले कंसल्टेंट ही प्रशिक्षित नहीं हो रहे हैं तो डीपीआर की गुणवत्ता और उसके आधार पर तैयार होने वाली सड़कों की गुणवत्ता कितनी सही होगी ?
डीपीआर में ही तय होती है सड़क की मजबूती
कंसल्टेंट की जिम्मेदारी होती है कि वह परियोजना स्थल की वास्तविक स्थिति का अध्ययन करें। इसमें यातायात का दबाव, मिट्टी की क्षमता, जल निकासी, मौसम और भौगोलिक परिस्थितियां, भविष्य की यातायात जरूरत तथा निर्माण से जुड़े तमाम तकनीकी पहलुओं का विस्तृत अध्ययन शामिल होता है।
यह भी पढ़ें- मुजफ्फरपुर में चांदनी चौक से रामदयालु सिक्सलेन सड़क निर्माण का रास्ता साफ, 500 पेड़ों पर चलेगी आरी
यह भी पढ़ें- लोहरदगा में बाईपास सड़क निर्माण स्थल पर ताबड़तोड़ फायरिंग, गार्ड को लगी गोली; बाल-बाल बचा कर्मचारी
फिर इन्हीं तथ्यों के आधार पर सड़क की डिजाइन, निर्माण तकनीक और जरूरी सामग्री से जुडे प्रविधान तय किए जाते हैं। ऐसे में डीपीआर तैयार करने में किसी तरह की कमी आगे चलकर निर्माण की गुणवत्ता, लागत और सड़क की उम्र पर सीधा असर डाल सकती है।
सही तकनीकी पहलुओं का विस्तृत अध्ययन न होना ही कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर देखने को मिलती है।
निर्माण पर करोड़ों खर्च, लेकिन शुरूआती तैयारी कितनी मजबूत?
देश में हाइवे और एक्सप्रेसवे के विस्तार पर लगातार बड़े पैमाने पर सरकारी धन खर्च किया जा रहा है। नई सड़कें आर्थिक गतिविधियों और बेहतर कनेक्टिविटी के लिए जरूरी हैं, लेकिन सड़क की गुणवत्ता सिर्फ निर्माण के दौरान इस्तेमाल की गई सामग्री से तय नहीं होती।
उसकी नींव परियोजना की योजना और डीपीआर में ही रखी जाती है।
