मोबाइल की स्क्रीन में सिमट रहा बचपन, बच्चों में दिख रहे ऑटिज्म जैसे लक्षण; नोएडा के DEIC में पहुंचे 15000 बच्चे
मोबाइल की लत के कारण बच्चों में ऑटिज्म जैसे लक्षण बढ़ रहे हैं, जिससे अभिभावक चिंतित हैं। नोएडा के डीईआईसी ...और पढ़ें
HighLights
मोबाइल की लत से बच्चों में ऑटिज्म जैसे लक्षण बढ़ रहे।
नोएडा DEIC में छह माह में 15,000 से अधिक बच्चे पहुंचे।
अत्यधिक स्क्रीन उपयोग 60% मामलों में ऑटिज्म लक्षणों का कारण।
स्वाति भाटिया, नोएडा। बच्चा सामने बैठा है, लेकिन पुकारने पर पलटकर नहीं देखता। खिलौने उसके हाथ में हैं, मगर उनसे खेलने के बजाय वह उन्हें एक कतार में सजाने में लगा रहता है। बच्चे की दुनिया जैसे मोबाइल की स्क्रीन तक सिमट गई है।
कुछ बच्चों में हाथ फड़फड़ाने, वस्तुओं को कतार में सजाने और दूसरों से घुलने-मिलने में कम रुचि लेने जैसे व्यवहार भी सामने आ रहे हैं। ऐसे लक्षणों को लेकर अभिभावक नोएडा के जिला प्रारंभिक हस्तक्षेप केंद्र (डीईआईसी) पहुंच रहे हैं।
आंकड़ों में दिख रही समस्या की भयावहता
- बीते एक साल में देशभर से मानसिक बीमारी और मोबाइल एडिक्शन और ऑटिज्म के 25 हजार से अधिक बच्चे पहुंच चुके हैं।
- बीते छह माह में केंद्र पर देशभर से 15 हजार से अधिक बच्चे पहुंचे हैं, जिनमें 60 प्रतिशत अत्यधिक स्क्रीन इस्तेमाल के बाद ऑटिज्म जैसे लक्षण देखे गए।
- इनमें करीब 200 नोएडा के ही मामले हैं। 50 प्रतिशत बच्चे दिल्ली-एनसीआर, नोएडा और गाजियाबाद से हैं।
- शेष मामले अलीगढ़, मेरठ, बदायूं, हरियाणा समेत उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के अन्य क्षेत्रों से भी मामले सामने आ रहे हैं।
'नियमित थैरेपी जरूरी'
मेरा बच्चा अभी सात साल का है पहले वह बोलता था, लेकिन बीते दो सालों से उसने बोलना बंद कर दिया है। जब मैं उसे नाम लेकर पुकारती थी, तो कई बार वह पलटकर भी नहीं देखता। शुरुआत में मुझे लगा कि उम्र के साथ सब ठीक हो जाएगा, लेकिन धीरे-धीरे मेरी चिंता बढ़ने लगी। मैं बच्चे को लेकर डीईआईसी पहुंची, जहां उसके विकास का आकलन कराने और नियमित थैरेपी की जरूरत के बारे में बताया गया। अब मुझे बस इंतजार है कि मेरा बच्चा कब अपनी बात शब्दों में कह पाएगा।
-अभिभावक, दिल्ली लक्ष्मीनगर।
'फोन वापिस लेते ही चिढ़चिढ़ा जाता था'
मेरा बच्चा मोबाइल देखने की जिद करता था। फोन हटाने पर वह चिड़चिड़ा हो जाता था और कई बार रोने या चीजें फेंकने लगता था। मुझे चिंता होने लगी कि वह दूसरे बच्चों के साथ घुलने-मिलने और बातचीत करने में कम रुचि क्यों दिखाता है। इसके बाद मैंने विशेषज्ञ से सलाह लेने का फैसला किया। मेरे शहर में सेंटर तो है लेकिन वहां से बेहतर यहां इलाज होता है। इसलिए मैं यहां पर थैरेपी के लिए आई हूं। अब मैं चाहती हूं कि बच्चे को समय पर थैरेपी मिले और मैं भी समझ सकूं।
-अभिभावक, आगरा।
साइकोलाॅजिस्ट की सलाह
हर बच्चे को ऑटिज्म से प्रभावित मानना सही नहीं है। बोलने में देरी या सामाजिक संपर्क में कठिनाई दिखने पर विकासात्मक मूल्यांकन कराना चाहिए। समय पर पहचान और उचित थैरेपी से बच्चे के संवाद और दैनिक जीवन के कौशल बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
-सुप्रिया भूषण, क्लिनिक्ल साइकोलाॅजिस्ट।
'हर बच्चे की जरूरत अलग'
विकास संबंधी समस्याओं वाले बच्चों के लिए समय पर जांच, परामर्श और नियमित थैरेपी जरूरी है। हर बच्चे की जरूरत अलग होती है। पर्याप्त विशेषज्ञों और प्रशिक्षित स्टाफ की कमी के चलते कई बार लंबी डेट लगानी पड़ती हैं, क्योंकि बच्चों की संख्या अधिक है।
-डाॅ. चित्रा चौहान, सेंटर इंचार्ज।
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