84 करोड़ का बजट मिला, खर्च हुए सिर्फ 34 करोड़; नोएडा की हवा में एक साल में 18.7% बढ़ा PM-10
नोएडा में नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के बावजूद प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है, पीएम10 और पीएम2.5 में वृद्धि ...और पढ़ें

नोएडा में भारी-भरकम फंड मिलने के बावजूद प्रशासनिक लापरवाही और ढुलमुल रवैये के कारण प्रदूषण पर लगाम लगाने के लक्ष्य अधूरे हैं।
HighLights
नोएडा में नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के प्रयास विफल रहे।
पीएम10 स्तर 2025-26 में 18.7% बढ़कर 184 माइक्रोग्राम/घन मीटर हुआ।
प्रदूषण नियंत्रण के 84.24 करोड़ में से केवल 34.32 करोड़ खर्च हुए।
चेतना राठौर जागरण, नोएडा। नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम का मकसद देश की आबोहवा में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) 10 और पीएम 2.5 जैसे घातक प्रदूषकों को कम करना था, लेकिन धरातल पर यह योजना हवा होती नजर आ रही है। भारी-भरकम फंड मिलने के बावजूद प्रशासनिक लापरवाही और ढुलमुल रवैये के कारण प्रदूषण पर लगाम लगाने के लक्ष्य अधूरे हैं।
कोई खास प्रयास नहीं किए जा रहे
शहर की हवा में पीएम 2.5 की 80.5 माइक्रोग्राम/घन मीटर उपलब्धता होने के बाद भी इसे कम करने के लिए कोई खास प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। जबकि सांसों के माध्यम से शरीर में अधिक मात्रा में जाते हैं। पीएम 10 पर ही ध्यानकेंद्रित किया जाता है। इसकी उपलब्धता है लेकिन अधिक खतरनाक पीएम 2.5 है।
प्राधिकरण खुद की पीठ थपथपा रहा
हाल ही में नोएडा प्राधिकरण ने पीठ थपथपाते हुए दावा किया था कि वर्ष 2020-21 की तुलना में वर्ष 2024-25 तक नोएडा के पीएम 10 स्तर में 21.31 प्रतिशत का बड़ा सुधार दर्ज किया गया है। लेकिन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ताजा आंकड़ों ने इस दावे की हवा निकाल दी है। यह तथाकथित सुधार क्षणिक साबित हुआ और वर्ष 2025–26 में प्रदूषण ने फिर से खतरनाक मोड़ ले लिया।
जहरीली हवा बढ़ा रही चिंता
सीपीसीबी के प्राण पोर्टल पर उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025–26 में नोएडा का वार्षिक पीएम 10 स्तर 155 माइक्रोग्राम/घन मीटर से बढ़कर 184 माइक्रोग्राम/घन मीटर हो गया है, एक वर्ष में लगभग 18.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
बता दें कि पीएम 10 का स्तर 100 माइक्रोग्राम/घन मीटर नुकसान दय नहीं है जबकि पीएम 2.5 विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, पीएम 2.5 का वार्षिक औसत स्तर 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 24 घंटे का औसत स्तर 15 से कम होना सुरक्षित माना जाता है जबकि शहर की हवा में बढ़ता स्तर चिंताजनक है।
बजट का नहीं कर सके उपयोग
आंकड़ों के मुताबिक प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर प्राधिकरण को 84.24 करोड़ का बजट आवंटित किया गया था, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती के कारण इसमें से केवल 34.32 करोड़ ही खर्च किए जा सके। इससे शहर की प्रदूषित हवा में कोई खास सुधार नहीं हो सका। वहीं बजट का आधे से अधिक हिस्सा बिना इस्तेमाल के पड़ा रहा और जनता जहरीली सांसें लेने को मजबूर रही।
मशीनें खरीदने तक सीमित
यह आंकड़ा ठीक उतना ही चिंताजनक है जितना जनवरी 2019 में नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एनकैप) की शुरुआत के समय देखा गया था, जब पीएम 10 का स्तर 18.7 प्रतिशत बढ़ा हुआ दर्ज किया गया था। यानी सालों की कवायद और करोड़ों रुपये बहाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है।
सड़कों पर उड़ती धूल, निर्माण कार्यों से निकलता धुआं और मैकेनिकल स्वीपिंग जैसी योजनाओं का ठप पड़ा क्रियान्वयन इस बात का सबूत है। 2 करोड़ मशीनों की खरीदारी तक ही सीमित रहे। जबकि अक्सर मशीनें न चलने की शिकायतें सामने आती रही हैं।
एक नजर आंकड़ों पर
वर्ष | पीएम 10 स्तर (माइक्रोग्राम/घन मीटर) | वृद्धि (प्रतिशत में) |
|---|---|---|
2024–25 | 155 | - |
2025–26 | 184 | लगभग 18.7 |
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