जल संकट: वाटर क्वालिटी इंडेक्स में 120वां स्थान पर भारत, एक्सपर्ट्स ने बताए जल संरक्षण के उपाय
एमिटी यूनिवर्सिटी ने विश्व जल दिवस पर जल प्रबंधन कार्यशाला आयोजित की। इसमें विशेषज्ञों ने भारत में जल संकट और दूषित जल की समस्या पर चिंता व्यक्त की।
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विशेषज्ञों ने भारत में जल संकट और दूषित जल की समस्या पर चिंता व्यक्त की। इमेज एआई जेनरेटेड

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जागरण संवाददाता, नोएडा। विश्व जल दिवस के अवसर पर, एमिटी यूनिवर्सिटी के 'प्राकृतिक संसाधन और पर्यावरण विज्ञान' विभाग ने छात्रों के लिए एक कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला का उद्देश्य सतत जल प्रबंधन, साथ ही जल और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना था। कार्यशाला का मुख्य विषय था।
"जल प्रबंधन के लिए अभिनव रणनीतियों के माध्यम से सतत विकास को गति देना।" इस कार्यक्रम का उद्घाटन पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (भारत सरकार) के वैज्ञानिक श्री संदीप, एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ एनवायरनमेंटल साइंसेज के मेंटर प्रो. डी.के. बंद्योपाध्याय, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (भारत सरकार) के वैज्ञानिक और सलाहकार डॉ. जगबीर सिंह, एमिटी यूनिवर्सिटी के 'प्राकृतिक संसाधन और पर्यावरण विज्ञान' विभाग के प्रमुख प्रो. एस.पी. सिंह और एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ एनवायरनमेंटल साइंसेज की सहायक निदेशक डॉ. रेनू धूपर ने किया।

एमिटी विश्वविद्यालय में कार्यशाला के अवसर पर मौजूद साइंटिस्ट सुंदीप
कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के वैज्ञानिक श्री संदीप ने उपस्थित लोगों से जल प्रबंधन के क्षेत्र में उभरती चुनौतियों को समझने और उनका समाधान करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि यद्यपि हमारी जल प्रबंधन की पारंपरिक प्रणालियाँ अत्यंत प्रभावी थीं, लेकिन बदलते समय के साथ हमने धीरे-धीरे उनका उपयोग कम कर दिया है और कुछ मामलों में तो उन्हें पूरी तरह से छोड़ ही दिया है।
परिणामस्वरूप, अब हम जल की आपूर्ति और मांग से संबंधित चुनौतियों से जूझ रहे हैं। एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ एनवायरनमेंटल साइंसेज के मेंटर प्रो. डी.के. बंद्योपाध्याय ने एक अत्यंत प्रासंगिक प्रश्न उठाया: "यदि आबादी के एक बड़े हिस्से को स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है, तो क्या हम वास्तव में 'विकसित भारत' के लक्ष्य को प्राप्त कर पाएंगे?"
'पृथ्वी पर मौजूद अधिकांश जल अब दूषित'
उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि पृथ्वी पर मौजूद अधिकांश जल अब दूषित हो चुका है, और बताया कि 'जल गुणवत्ता सूचकांक' (Water Quality Index) में भारत वर्तमान में 122 देशों में से 120वें स्थान पर है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के वैज्ञानिक और सलाहकार डॉ. जगबीर सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि जल की प्रत्येक बूंद अनमोल है।
उन्होंने बताया कि प्राचीन काल से ही, हमारे वेदों और उपनिषदों में जल संरक्षण के महत्व को रेखांकित किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि हमें छात्रों को व्यावहारिक अनुभव के अवसर प्रदान करने चाहिए, और अनुसंधान तथा नवाचार के क्षेत्रों में अंतर्विषयक ज्ञान (interdisciplinary knowledge) को एकीकृत करना चाहिए।
यह देखते हुए कि हमारा देश तीन ओर से समुद्र से घिरा हुआ है और ताज़े पानी के स्रोत लगातार कम होते जा रहे हैं, अब वह निर्णायक क्षण आ गया है जब हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों के अधिकतम संभव संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। इस अवसर पर, Corteva Agriscience में 'कॉटन इन्सेक्टिसाइड स्ट्रेटेजी लीड' शबनम हुसैन ने IP University की प्रो. अंशु गुप्ता और नई दिल्ली स्थित केंद्रीय जल आयोग के वैज्ञानिक डॉ. संदीप कुमार शुक्ला के साथ अपने विचार साझा किए।
