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कचरे से कमाल! एमिटी ने विकसित की नई तकनीक, 70% प्लास्टिक कचरा बनेगा मजबूत पैनल

Published: Mon, 23 Mar 2026 05:36 PM (IST)

एमिटी विश्वविद्यालय, नोएडा ने बांस की धूल और पुनर्चक्रित प्लास्टिक से टिकाऊ कम्पोजिट सामग्री बनाने की तकनीक विकसित की है। ...और पढ़ें

अब कचरे को संसाधन में बदलकर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में नया रास्ता दिखा रही है। इमेज एआई जेनरेटेड

अब कचरे को संसाधन में बदलकर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में नया रास्ता दिखा रही है। इमेज एआई जेनरेटेड

HighLights

  1. बांस की धूल और पुनर्चक्रित प्लास्टिक से बने पैनल।

  2. प्लास्टिक कचरा 70-80% तक कम करने में सहायक।

  3. निर्माण और फर्नीचर में टिकाऊ, किफायती विकल्प।

स्वाति भाटिया, नोएडा। तेजी से बढ़ते शहरीकरण और प्लास्टिक कचरे की समस्या के बीच एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। एमिटी विश्वविद्यालय में विकसित एक अनोखी तकनीक अब कचरे को संसाधन में बदलकर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में नया रास्ता दिखा रही है।

प्रो. हर्षा खड़कवाल के नेतृत्व में तैयार इस नवाचार में बांस की धूल और पुनर्चक्रित प्लास्टिक को मिलाकर मजबूत, टिकाऊ और सस्ती कम्पोज़िट सामग्री तैयार की गई है। यह तकनीक न केवल प्लास्टिक प्रदूषण कम करेगी, बल्कि लकड़ी के विकल्प के रूप में भी काम आएगी।

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तैयार पैनल की जानकारी देते हुए डॉ. हर्षा

इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें 60–80 प्रतिशत तक पुनर्चक्रित प्लास्टिक हाई-डेंसिटी पालीएथिलीन, लो-डेंसिटी पालीएथिलीन, पालीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (एचटीपीई, एलडीपीइडी और पीईटी ) और 20–40 प्रतिशत तक बांस या लकड़ी का अपशिष्ट उपयोग किया जाता है।

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बांस का पाउडर जिसका पैनल बनाने में प्रयोग किया गया। जागरण

शोध के दौरान 5 किलोग्राम के मिश्रण में 70 प्रतिशत प्लास्टिक और 30 प्रतिशत बांस पाउडर का सफल प्रयोग किया गया। इस प्रक्रिया में पहले बांस को बारीक धूल में बदला जाता है, फिर साफ किए गए प्लास्टिक टुकड़ों के साथ मिलाकर गर्म किया जाता है और अंत में संपीड़न ढलाई तकनीक से पैनल का रूप दिया जाता है।

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रिसाइकिल के लिए प्रयोग किया जाने वाला प्लास्टिक जिसका पैनल बनाने में किया गया प्रयोग

70 प्रतिशत तक कचरा होगा कम, प्रदूषण में बड़ी राहत

यह तकनीक पर्यावरण के लिए बेहद कारगर साबित हो सकती है। अनुमान है कि इससे 70–80 प्रतिशत तक प्लास्टिक कचरे का पुनः उपयोग संभव है, जिससे लैंडफिल पर दबाव 60–70 प्रतिशत तक कम हो सकता है।

वहीं, लकड़ी या बांस के अवशेषों के उपयोग से खुले में जलाने की घटनाएं घटेंगी, जिससे 30–40 प्रतिशत तक वायु प्रदूषण में कमी आ सकती है। कुल मिलाकर यह वेस्ट-टू-रिसोर्स तकनीक प्रदूषण भार को 50–70 प्रतिशत तक कम करने में सक्षम है।

मजबूती और टिकाऊपन में बेहतर विकल्प

बांस फाइबर और प्लास्टिक के संयोजन से बने ये पैनल काफी मजबूत होते हैं। इनमें नमी, दीमक और कीटों के प्रति उच्च प्रतिरोध होता है। यही वजह है कि इनकी आयु 30 साल से अधिक मानी जा रही है। ये न तो आसानी से सड़ते हैं और न ही मुड़ते या फटते हैं। साथ ही, इनका रखरखाव भी बेहद आसान है-पेंट या पालिश की जरूरत नहीं, सिर्फ पानी से सफाई पर्याप्त है।

निर्माण से फर्नीचर तक, हर क्षेत्र में उपयोग

इन कम्पोजिट पैनलों का उपयोग कई क्षेत्रों में किया जा सकता है। जैसे-आउटडोर डेकिंग, बाड़, गार्डन फर्नीचर, पार्क बेंच, दीवार पैनल, दरवाजों के कोर, फार्मवर्क बोर्ड, प्लांटर बाक्स और औद्योगिक पैलेट। समुद्री क्षेत्रों में भी इनका उपयोग संभव है क्योंकि इनमें पानी का अवशोषण 2.5 प्रतिशत से कम होता है।

पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को फायदा

यह तकनीक सर्कुलर इकोनामी को बढ़ावा देती है। एक तरफ प्लास्टिक कचरे का पुनर्चक्रण होता है, तो दूसरी तरफ नई लकड़ी की मांग 30–50 प्रतिशत तक घट सकती है, जिससे वनों का संरक्षण संभव है। साथ ही, यह सामग्री किफायती होने के कारण आम लोगों के लिए भी सुलभ विकल्प बन सकती है।

औद्योगिक स्तर पर तैयार, पेटेंट भी मिला

इस नवाचार को पेटेंट मिल चुका है और इसे औद्योगिक स्तर पर सफलतापूर्वक विकसित किया जा चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह तकनीक निर्माण और फर्नीचर उद्योग में बड़ा बदलाव ला सकती है।

नोएडा से निकला यह नवाचार “कचरे से कमाल” की मिसाल बनकर उभरा है। बांस और प्लास्टिक का यह अनोखा मेल न सिर्फ मजबूत और टिकाऊ है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।

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