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सर्दियों की जैकेट से मीरापुर बना मिनी लुधियाना, घरों में चल रही फैक्ट्रियां, महिलाओं को भी मिला रोजगार

Published: Thu, 22 Oct 2026 10:11 AM (IST)

उत्तर प्रदेश के मीरापुर में सर्दियों की जैकेट का कारोबार 24 साल में एक छोटे उद्यम से बड़े उद्योग में बदल गया है।

सुपर सोफ्टी वैराइटी की जैकेट को दिखाता कारोबारी किनान। जागरण

सुपर सोफ्टी वैराइटी की जैकेट को दिखाता कारोबारी किनान। जागरण

HighLights

  1. मीरापुर में 35 जैकेट कारखाने, सैकड़ों को रोजगार।

  2. 24 साल में छोटा कारोबार बना बड़ा उद्योग।

  3. विभिन्न वैरायटी की जैकेटें देशभर में होती हैं सप्लाई।

सोनू धीमान, मुजफ्फरनगर। उत्तर प्रदेश के मीरापुर में सर्दियां शुरू होते ही सिलाई मशीनों की रफ्तार और कारोबार की सरगर्मी बढ़ गई है। 24 वर्ष पहले शुरू हुआ छोटा कारोबार अब बड़े उद्योग में बदल चुका है। यहां अलग-अलग स्थानों पर चल रहे 35 कारखानों में महिलाएं और पुरुष काम कर रहे हैं। यहां बनी विभिन्न वैराइटी की जैकेट देशभर में सप्लाई होती है। लुधियाना, श्रीनगर और नैनीताल के कारोबारी भी यहां से माल खरीदते हैं।

मोहल्ला बेरी बाग, मुश्तर्क, रसूलपुर और मुझेडा में स्थित कारखानों में सुपर आफ्टी, डबल टोन, लांबा और टीआर जैसी लोकप्रिय वैराइटी की जैकेटें तैयार की जा रही हैं। मीरापुर में जैकेट के बढ़ते कारोबार के चलते इसे 'मिनी लुधियाना' भी कहा जाने लगा है।

दिल्ली से आता है कच्चा माल

वर्ष 2002 में नईम मंसूरी और सरफराज तोमर ने इस मौसमी कारोबार की शुरुआत की थी। आज छोटे-बड़े करीब 35 कारखाने स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार का आधार बन चुके हैं। जैकेट बनाने के लिए कच्चा माल दिल्ली के गांधीनगर से मंगाया जाता है।

इसके बाद कारखानों में आधुनिक और हाई-स्पीड सिलाई मशीनों से उत्पाद तैयार किए जाते हैं। यह कारोबार हर साल अगस्त से जनवरी तक, यानी करीब पांच से छह महीने चलता है। प्रत्येक कारखाने में औसतन 25 से 30 स्थानीय युवक काम करते हैं, जबकि महिलाएं घरों में जैकेटों में अस्तर लगाने का काम करती हैं। पूरे सीजन में एक कारखाने में करीब 25 से 30 हजार जैकेट तैयार होती हैं। कारीगरों के लिए यह सीजन अच्छी आजीविका का साधन है।

मोहम्मद तालिब, मुजक्किर और सलमान ने बताया कि उन्हें प्रति जैकेट सिलाई के 50 रुपये मिलते हैं। एक कुशल कारीगर रोजाना 15 से 18 जैकेट तैयार कर लेता है। नईम मंसूरी के मुताबिक, एक सामान्य जैकेट 300 रुपये में तैयार होती है। कारखाने से निकलने के बाद इसे थोक व्यापारियों को 25, 30 से 40 रुपये के मामूली मार्जिन पर बेचा जाता है।

स्थानीय युवक ठंडे इलाकों में बेचते हैं जैकेट

मीरापुर व आसपास के सैकड़ों युवक यहां से माल खरीदकर कश्मीर, लद्दाख, नैनीताल, शिमला, श्रीनगर आदि ठंडे इलाकों में फेरी लगाकर जैकेट बेचते हैं। जैकेट के इस कारोबार से स्थानीय युवाओं को बड़ा रोजगार मिलता है।

लघु उद्योग के अंतर्गत मिलता है लोन

जैकेट के छोटे से कारोबार को बड़ा उद्योग बनाने में प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं भी सहयोगी बनी हैं। नईम मंसूरी ने बताया कि सरकार की योजना के अंतर्गत लघु उद्योग के लिए बैंक से लोन लेकर कई युवा इस उद्योग को कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि बैंक पांच से 10 लाख रुपये का लोन मुहैया कर देता है।

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